प्रश्नोत्तर P12-0128 · भाग 12
योगी जी, आप जो कह रहे हो वो समझ में आ रहा है कि हम अपने आप को स्थापित करना चाह रहे हैं। लेकिन बचपन से हमें सिखाया गया कि बांटकर खाओ, सामने वाले के मांगने से पहले ही ऑफर कर दो। तो क्या एक साधक-जिज्ञासु के रूप में मुझे ये सारे पैटर्न बदलने पड़ेंगे?
एकदम, हमें देखना है कि मैं कहां हूं। देश-काल-स्थिति-परिस्थिति में मैं जहां हूं, वैसा मुझे जीना पड़ेगा, तभी तो वहां की ऊर्जा मुझ पर काम करेगी। अगर हम विपरीत में जिएंगे — जैसे गर्मी में स्वेटर पहनो और ठंड में गर्मी वाला कपड़ा पहनो — तो क्या हाल होगा? आप जहां हो, उसी नियम-संयम में जीना पड़ेगा; हमेशा ध्यान रखना पड़ेगा कि आप कहां हो, किसके साथ हो, और आपका कितना अधिकार है। क्योंकि आप अपने अधिकार में अगर काम करोगे तो आपका स्तर उठेगा। सामने वाले ने मुझे कितना अधिकार दिया है — मेरी योग्यता के अनुसार ही तो अधिकार देगा। तो जितना अधिकार मिला है, उतना मेरा काम करना है। सामने वाला क्या सोच रहा है, उससे क्या मतलब? मुझे उससे व्यवहार ही नहीं बनाना है; मैं जिसके लिए जहां पर हूं, वो काम करूं। तभी वहां की पूरी ताकत आप पर काम करेगी। संसार में कोई भी वस्तु हो, अगर आप उसे ना रिपेयर करो, ना संभालो, तो धीरे-धीरे उसका नाश हो जाता है; वैसे ही अगर आप अपने आप को बाहर से ना भरो, तो जितना है ऐसे ही खत्म हो जाएगा। और भरते कब हैं? अपनी व्यवस्थाएं जुटाने के लिए। जब मुझे कोई व्यवस्था जुटानी ही नहीं है, तो किसी से व्यवहार या लेनदेन करने की क्या जरूरत है? मुझे उसकी भूख दिख गई और उसे नहीं दिख रही — इसका मतलब मेरे अंदर उससे ज्यादा मान है। तो साधक को हर क्षण सचेत रहना है कि मैंने कौन सा शब्द किस देश-काल-स्थिति-परिस्थिति में, क्यों और किस भाव से बोला, और क्या उस शब्द पर मेरा अधिकार है। एक शब्द भी आपको उलझा देगा; एक गांठ भी फंस गई तो आप वहीं रुक गए। गांठ मारने में टाइम नहीं लगता, लेकिन खोलने में बड़ी मेहनत करनी पड़ती है। तो भाई, आप नया क्यों पैदा करना चाहते हो, क्यों व्यवहार बनाना चाहते हो? निकलना है तो ये निकलने वालों के लिए है; और जिसे नहीं निकलना, वो चाहे जैसे जिए।
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वीडियो: अगर साधक है तो भरना क्यों चाहता है ? #योगी · 2026-09-14