प्रश्नोत्तर P12-0135 · भाग 12
जन्मों-जन्मों के संस्कार ही मेरा बेसिक नेचर बन गए हैं, लोग कहते हैं ये नहीं बदलने वाला। अध्यात्म की यात्रा में भी मैं उसी संस्कार को बार-बार पोषण दे रहा हूं — वही लोभ-लालच, मान का चक्कर, छल-कपट — उसी लूप में घूम रहा हूं। तो क्या प्रत्यक्ष ज्ञान यह कहता है कि उस पुरानी जड़ता को मिटाने के लिए मैं उसे पोषण ही ना दूं और नई आदत बनाता रहूं — और इसी का नाम साधना है?
हां, एकदम नहीं देना। अगर थोड़ा भी दिया, तो फिर वो हरा हो जाएगा, वो मिटेगा नहीं; किसी भी तरीके से देना ही नहीं। अब पता चला कि बहुत लोग वहां तो छोड़कर आते हैं और यहां नए रिश्ते बना लेते हैं — गुरु भाई, गुरु बहन, गुरु चाचा, गुरु दादा — और उन रिश्तों में जीने लगते हैं; तो वहां तो नहीं दिया, यहीं देने लगे, बस देने का तरीका अलग था। बाहर से किसी भी तरह का कुछ भी मत दो। अगर तुम कुछ भी कर रहे हो, तो देखो कि ये क्यों कर रहे हो — मान है, दिखावा है? हम तो यहां भी खेल लेंगे। बस इतना हो कि मैं जरूरत में कर रहा हूं, मुझे इससे कुछ नहीं चाहिए; सामने आया, मैंने कर दिया, मैंने कोई धारणा ही नहीं बनाई। लेकिन ऐसा भी नहीं कि सामने जरूरत हो तब भी सोचूं कि नहीं करना है। और जिसके लिए आया हूं, वो जरूर करना।
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वीडियो: नया भरना बंद कर #योगी · 2026-09-13