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प्रश्नोत्तर P13-0063 · भाग 13

कहते हैं ध्यान लगाओ, ध्यान लगाओ — ध्यान लगाएं कैसे? ध्यान क्या है?

ध्यान करना नहीं है; ध्यान तो अपने आप लग रहा है — 'चाहिए' में। ध्यान घटित हो रहा है; चाहिए में ध्यान जा रहा है, राग में, द्वेष में, चाहे बहिर्मुखी, चाहे अचेतन मन में। पांच इंद्रियों द्वारा हम विचार इकट्ठा करते हैं — शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श। आंख बंद कर ली, तो हम अचेतन मन में जल्दी चले जाते हैं। फिर जो भी हो रहा है, उसे दृष्टा भाव से देखो। चाहे मान में जाए, चाहे अपमान में — किसी ने आपका अपमान किया है, तो वर्तमान में बैठे-बैठे अतीत की घटना याद करते हो और भविष्य का निर्माण करते हो कि मैं बदला लूंगा। तो ध्यान में ध्यान करो। ध्यान हमसे है, ध्यान से हम नहीं हैं; इसलिए मुझे ध्यान नहीं करना है, हमें तो ध्यान में ध्यान करना है — राग-द्वेष से अपने आप को छुड़ाना है। जो भी हो रहा है, उसे देखते-देखते उस गहराई में जाइए — क्यों हो रहा है, क्या कारण है, मैं तो इसे छोड़ना चाहता हूं, छूट क्यों नहीं रहा? तो पश्चाताप होगा — मेरे कर्म का भोग है; गलती का एहसास करो, फिर धीरे-धीरे उससे छूटने लगोगे। सिर्फ किसी बिंदु पर, किसी मंत्र पर, माला लेकर बैठ जाना ध्यान नहीं। आंख बंद करते ही पुरानी बातें याद आती हैं, और हम उन्हें रोकना चाहते हैं — रोकिए मत, वो अचेतन मन में जमा है, रोक नहीं सकते; दृष्टा भाव से देखते रहिए, देखते-देखते आखिरी तक जाओगे तो वह खत्म हो जाएगा। जैसे कई गांठें लगी हों, तो एक-दो खोलकर छोड़ दोगे तो नहीं खुलेगा; आखिरी गांठ खोलोगे तो सब गिर जाएगा। ज्यादातर हम श्वास पर या बिंदु पर ध्यान करते हैं — जैसे रबड़ को किसी विधि से, ताकत से खींचा, छोड़ोगे तो वहीं जाएगा ना; काश उस रबड़ से छुड़ा लेते, तो रबड़ ही गिर जाता। मूल राग-द्वेष है — जैसा मैंने चाहा हो गया तो राग, नहीं हुआ तो द्वेष। राग-द्वेष से छूटने के लिए अनुमान लगाना छोड़ दो, और कुछ भी खा-पी रहे हो तो 'ठीक' शब्द का प्रयोग करो — अच्छा बोलोगे तो राग होगा, बुरा बोलोगे तो द्वेष; ठीक में न अच्छा होता है, न बुरा। ध्यान में एक-दो घंटे जब भी बैठो, बस दृष्टा भाव से देखो, निर्णय नहीं करना है — निर्णय करता अहंकार है, अहम भाव को गिराना है। कोई काम कर रहे हो तो समय मत दो कि कब तक हो जाएगा — जैसे किसान ने फसल बोई और बोल दिया इतना क्विंटल होगा; हुआ तो अहम भाव में बताएगा, नहीं हुआ तो शर्माएगा, दोनों में फंस गया। काश बोल देता कि मैं मेहनत कर रहा हूं, जितना होगा होने के बाद बता दूंगा — तो अहम भाव काम ही नहीं करता। अनुमान लगाना छोड़ दोगे तो कर्ता का भाव प्रकट नहीं होगा, और ठीक शब्द का प्रयोग करोगे तो राग-द्वेष बनेंगे ही नहीं।

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वीडियो: कहते हैं ध्यान लगाओ ध्यान है क्या ? #योगी #ध्यान #meditation · 2026-07-01