प्रश्नोत्तर P14-0138 · भाग 14
प्रभु, कुटिया साधक के लिए है, तो कोई साधना है जो आप यहाँ करने के लिए बताते हो?
कोई साधना नहीं। सत्संग मैं बोल देता हूँ, फिर साधक अपने आप में रहे। यहाँ के सिस्टम में कुछ दिन रहोगे तो खुद समझ में आ जाएगा कि यहाँ रहना ही साधना है। व्यावहारिक बातें कर नहीं सकते, मोबाइल स्विच ऑफ, इधर-उधर जा नहीं सकते, मँगा के कुछ खा नहीं सकते, किताब पढ़ नहीं सकते, और कोई आपसे कोई सेवा नहीं करवाएगा। तो करोगे क्या? जब कुछ करोगे ही नहीं तो साधना ही होगी, आत्मिक चिंतन अपने आप होगा। कुछ नहीं करना ही करना है; करना आसान है, कुछ ना करना बहुत कठिन है। यहाँ रहोगे तो सधोगे, नहीं तो भागोगे। यहाँ कोई भी नियम मेरे द्वारा व्यक्तिगत नहीं बना, सब मिला है, और इस सिस्टम में मैं भी जीता हूँ; भोजन बनाने से लेकर बर्तन माँजने, कचरा बीनने तक मैं अपना काम खुद करता हूँ। यहाँ ना कोई पुराना है ना नया, ना जूनियर ना सीनियर; सब साधक एक समान हैं। किसी को कुछ करने को कहने का अधिकार किसने दिया? आपको लगता है गिलास उठाना चाहिए तो खुद उठा दो। हम हर जगह अपना आधिपत्य जमाना चाहते हैं कि मैं कुछ हूँ — यही गड़बड़ है।
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