आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P15-0063 · भाग 15

मैंने संन्यास लिया, पर उसके बाद अंदर उदासीपन आ गया, वहाँ रुक नहीं सका; अब गुरु के दूसरे आश्रमों में जाने का मन ही नहीं करता।

यहाँ मैं आप लोगों से एक ही बात कहूँगा — आपको यहाँ कोई बंधन नहीं है। आप किसके शिष्य हैं, किस मार्ग से चल रहे हैं, किसे गुरु मान के चलते हैं, मुझे मतलब नहीं। आपके आत्मिक कल्याण के लिए ज्ञान से, रहने से, भोजन से जितनी सहायता मेरी तरफ से हो सकती है, मैं करूँगा; एक दिन से लेके आजीवन रहिए। यहाँ व्यक्तिगत मेरा कोई मार्ग नहीं, कोई विधि नहीं; प्रत्यक्ष ज्ञान है, और ज्ञान किसी का होता नहीं। आप किसी भी मार्ग से जाएँ, इस ज्ञान का उपयोग करना पड़ेगा। यहाँ का कोई मालिक नहीं — ना मैं ना आप; ये व्यवस्था साधकों के लिए है, तो अधिकार से, बिना संकोच, बिना दबाव साधक बनके रह सकते हैं। आपस में बहस करो, पर उस तर्क में प्रेम हो, समझने के लिए बात हो, समझाने के लिए नहीं। जब समझाने के लिए बात होती है तो तर्क कुतर्क में जाता है, और कुतर्क में आदमी सामने वाले को नहीं, अपने आप को गिराता है।

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वीडियो: इतनी पूजा पाठ भक्ति करते हैं लेकिन दुख क्यों आते हैं ? #प्रत्यक्षज्ञान #yogijikasatsang #आध्यात्म · 2026-08-10