आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P15-0120 · भाग 15

मेरे भगवान, मैं मन को शरीर रूपी रथ का घोड़ा मानता था, लेकिन आपने बताया कि घोड़ा मन नहीं है, मैं हूं — मिला-जुला के सब कुछ आप ही हो?

यही तो भ्रम है। लोगों ने लोगों को उलझा दिया; उस सवाल को हल करने के लिए बोल दिया जो सवाल ही नहीं है, और अब आप हल करने में लगे हो। जैसे एक दिन मेरे से किसी ने पूछा कि पहले मुर्गी आई कि पहले अंडा; हमने कहा पहले मुर्गा का पता लगाओ, यह मुर्गा ही बता सकता है। हमारे सामने वह काम रख दिया गया जो कभी हो ही नहीं सकता — कि मन को रोको। अरे मन किसके लिए काम करता है? शरीर के लिए। भूख लगी, तो मन कहां जाएगा? भोजन पे। भूख लगी है यह बताएगा, और जितनी जानकारी आपके पास भोजन की है वह बताएगा, उससे ज्यादा नहीं। वो आपके लिए काम ही नहीं करता, शरीर के लिए काम करता है; तो वह आपकी बात कैसे सुनेगा? वह चाहिए में काम करता है — जैसे ही शरीर की जरूरत होती है, मन आ जाता है। मन है भी और नहीं भी, अगरबत्ती के धुएं की तरह: अगरबत्ती जली तो धुआं आ गया, नहीं जली तो धुआं नहीं; उसको तोड़ के टुकड़े-टुकड़े कर दो, धुआं नहीं मिलेगा। पहले आप नशा नहीं करते थे तो मन नशे पर नहीं जाता था; जब आपने शरीर को नशे का आदी बना दिया, तो मन बताता है कि शरीर की ये जरूरत है। वो यह नहीं कह रहा कि तुम पियो कि ना पियो; बस इंगित करता है। देना ना देना आपके ऊपर है। तो मन को रोकने की कोई जरूरत ही नहीं है, क्योंकि जो आपके लिए काम नहीं करता वो रुकेगा कैसे? एक तरफ तुम्हें चाहिए, एक तरफ मन को रोक रहे हो — ये लड़ाई पूरी जिंदगी चल रही है। कोई माला ले बैठ गया, कोई विधि ले बैठ गया, कोई ध्यान कर रहा है — मन को रोक रहा है, विचारों को रोक रहा है। सालों-साल गुजार दे रहे हैं लोग, और ये हो नहीं सकता।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: हमारी स्मृतियां कब संस्कार बनती हैं ?#प्रत्यक्षज्ञान #yogijikasatsang #साधना #आध्यात्म · 2026-08-11