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प्रश्नोत्तर P16-0133 · भाग 16

योगी जी, मेरा प्रश्न है कि यह जीवन क्या है? केवल मनुष्य ही नहीं, हर कीट-पतंग, जीव-जंतु — एक चींटी को भी मारने की कोशिश करें तो वह भी अपने प्राण बचाती है। और कहते हैं कि मनुष्य योनि सबसे सर्वश्रेष्ठ है — यह तो मनुष्य ने खुद ही घोषित कर लिया, जबकि जितना मनुष्य गर्त में जा सकता है उतना शायद कोई और योनि नहीं जाती। बाकी योनियों को भोग योनि कहकर नीचा दिखा दिया। प्रत्यक्ष ज्ञान इसके बारे में क्या कहता है?

देखिए, पहली बात तो यह समझनी है कि मानव तन को सर्वश्रेष्ठ शरीर कहा गया है। "हम मानव हैं" — यही समझ लेना गलती है। हमें मानव तन मिला है; पृथ्वी पर जितने भी शरीर हैं, उनमें इस शरीर को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है, व्यक्तिगत आपको नहीं कहा गया। अब आपके कर्म के ऊपर है कि जैसा शरीर मिला है वैसा आपका कर्म है या नहीं। क्योंकि इसमें संभावना है — सात्विक, राजसी, तामसी। इस शरीर का मूल स्वभाव सात्विक है, लेकिन आपको स्वतंत्रता दी गई है कि आप राजसी भी अपना सकते हो, तामसी भी। अन्य शरीरों में ऐसी स्वतंत्रता नहीं है। ना किसी को जानवर समझो, ना किसी को मानव — ये तन हैं। इस तन को सर्वश्रेष्ठ इसलिए कहा गया क्योंकि यही एक तन ऐसा है जिसके द्वारा इसमें रहने वाला परोपकार भी कर सकता है और दुष्कर्म भी; बाकी शरीरों के द्वारा दुष्कर्म नहीं हो सकता, वे प्राकृतिक जीते हैं। मानव शरीर के अलावा किसी शरीर में रहने वाले को कभी दुष्ट या राक्षस नहीं कहा गया, लेकिन देवता या महात्मा भी नहीं कहा गया। जिसे मानव तन मिला, उसे राक्षस भी कहा गया, देवता भी, महात्मा भी, संत भी — कर्मों के अनुसार। जैसे धातुओं में स्वर्ण को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है उसके गुणों के कारण, सिर्फ पीला होने से नहीं — पीला तो पीतल भी होता है। वैसे ही मानव तन में जब आप सात्विक प्रवृत्ति में जीते हो, तब वह व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ है। और बाकी शरीर निकृष्ट नहीं हैं; उन्हें ना अच्छा बोला गया है ना बुरा, क्योंकि उन्हें कर्म का अधिकार नहीं है — वे पैदा करके नहीं खाते। मानव तन जिसे मिला है वही पैदा करके खाता है, और परोपकार की भावना, दुष्टता की भावना इसी में रहती है। अगर आप हजारों साल पीछे की बात करो, तो उस समय ये भी थे और मानव तन भी था — फिर मानव तन ही क्यों विकसित हुआ? क्योंकि इसमें संभावना थी, क्षमता थी — गिरने की भी, उठने की भी। बाकी शरीरों में कर्ता का अधिकार नहीं है, इसलिए उनकी समझ वहीं की वहीं है; जैसा शरीर का स्वभाव है उसी में जीते हैं, और कोई अलग आदत बनती है तो मानव उन्हें ट्रेंड करता है। तो पहले यह समझिए कि आप मानव नहीं, जीवात्मा हो; आपको यह मानव तन आत्मिक कल्याण के लिए मिला है। यहां कोई छोटा-बड़ा नहीं है — लोहे की प्रतिमा बन जाती है तो सोना उसके चरणों में चढ़ता है; बात जरूरत की है। आपका कर्म कैसा है, यह बात है। आज तक पृथ्वी पर किसी और जीव के सुधरने के लिए कुछ लिखा गया क्या? मानव में ही बिगड़ने और सुधरने की, भोग-भोजन और योग की दोनों संभावनाएं हैं; बाकी में योग की संभावना नहीं, लेकिन वे भी इसी शरीर की तरफ यात्रा कर रहे हैं। जैसे राज्य में कोई राजा है और कई लोग राजा बनने की यात्रा कर रहे हैं — राजा यह ना समझे कि मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूं; उन्हें भी मौका मिलेगा, और राजा भी गलत करे तो उसे दंड मिलता है। यह शरीर सर्वश्रेष्ठ है, लेकिन इसमें रहने वाला कैसा है, यह उसके ऊपर है — वह कर्म करके निकृष्ट भी हो सकता है और सर्वश्रेष्ठ तक भी जा सकता है। अन्य शरीर ना सर्वश्रेष्ठ तक जा सकते हैं ना निकृष्ट हो सकते हैं; उन्हें पाप-पुण्य नहीं लगता। हिरण घास खाती है, शेर मांस खाता है, लेकिन पाप-पुण्य उसे नहीं लगता — जिसको जो स्वभाव दिया, उसमें जीता है। मानव को सर्वाहारी कहा गया है, सब खाने की संभावना है; इसे समझ मिली है कि सात्विक भोजन करे, लेकिन जैसा खाएगा, जैसा करेगा, वैसा परिणाम इसे मिलेगा। मानव के लिए ही कहा जाता है कि यह पाप कर रहा है, पुण्य कर रहा है, परोपकार कर रहा है; किसी जानवर के लिए ये शब्द कभी निकले? उनके लिए कोई समाज, कानून, जेल नहीं है। तो समझिए, मानव हमारा एक चोला है; अपने आप को मानव ना समझें — जैसे ही आपने अपने आप को मानव समझा, आप भ्रमित हो जाओगे।

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वीडियो: जीवन क्या है ? #योगी · 2025-10-07