प्रश्नोत्तर P16-0175 · भाग 16
योगी जी, संत तुलसीदास जी अपनी धर्मपत्नी रत्नावली में इतने आसक्त थे कि लाश को नाव और लटकते नाग को रस्सा समझ बैठे। रत्नावली ने कहा कि जितनी प्रीति इस हाड़-मांस से है, उतनी राम जी से होती तो बेड़ा पार हो जाता — और उनकी जिंदगी में यू-टर्न आ गया। ऐसी लोकोक्तियां तो हम भी सुनते हैं, पर हम पर असर नहीं होता, उल्टा कहते हैं "तू अपना देख"। तो यह बदलाव बोलने वाले के प्रभाव से हुआ या सुनने वाले की स्थिति से? बोलने वाले की बातें हम पर असर कब करती हैं?
तुलसीदास जी अपनी पत्नी से आत्मीय प्रेम करते थे, सिर्फ शरीर का उनका लगाव नहीं था। शरीर एक निमित्त था, उनका आत्मिक लगाव था। जब किसी भी व्यक्ति से हमारा आत्मिक लगाव होता है तो उसके जीवन का एक-एक शब्द मेरे ऊपर काम करता है। और अगर हमने उसे सिर्फ भोग के लिए पकड़ा है तो वो कुछ भी बोले, कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि हम तो उसका शोषण कर रहे हैं — मुझे उसे अपने तरीके से भोगना है, उसके तरीके से नहीं। तुलसीदास शरीर के भोग में नहीं गए थे; अगर गए होते तो इतना सुनने के बाद भी भोग करते — बोल देते "तू ज्यादा ज्ञान मत दे"। जब आत्मिक लगाव होता है और वह व्यक्ति जरा सा भी हमें भोग का नाम देता है, तो वहां वैराग्य जग जाता है; वो सब कुछ त्याग करके चला जाता है, क्योंकि वो बताना चाहता है कि मैं इस हाड़-मांस के पुतले के लिए तेरे पास नहीं आया था, मैं तेरे लिए आया था — तो आज से मैं इस हाड़-मांस के पुतले का त्याग करता हूं, हमेशा के लिए। जिसका लगाव सिर्फ भोग से है, शरीर से, वस्तुओं से — उसे कितनी भी गाली दो, वह समझौता कर लेगा, क्योंकि वह उस भोग के बिना नहीं रह सकता; उसे सामने वाले की पीड़ा, तड़प से लेना-देना नहीं। तुलसीदास को अगर शरीर से आसक्ति होती तो जाकर दूसरा विवाह कर लेते — भोग की कमी इस संसार में है ही नहीं — पिंड मिल जाता, लेकिन उनकी पत्नी उस पिंड में नहीं मिलती। इससे सिद्ध होता है कि उन्हें आत्मिक प्रेम था। और उनकी पत्नी ने भी ऐसा इसलिए बोला क्योंकि वह भी उन पर निर्भर नहीं थी। व्यंग्यात्मक शब्द, सच्चाई आदमी तभी बोल पाता है जब निर्भर नहीं रहेगा। गुलाम कभी सच नहीं बोल पाता।
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वीडियो: खुद को जांच ने का तरीका #योगी · 2026-02-20