प्रश्नोत्तर P17-0034 · भाग 17
गुरु जी, यह कहा जाता है कि पकड़ना है तो एक गुरु को पकड़ो, वही तुम्हें पार करा देगा; यदि गुरु बदलते ही रहे तो कहीं नहीं पहुंचोगे — इस पर क्या कहेंगे?
गुरु पकड़ो — तो गुरु को शरीर मानते हो कि शब्द? गुरु शब्द है। पानी नहीं आ रहा तो नल को पकड़ के क्या करोगे — प्यासे मरोगे। आप नल के पास पानी के लिए गए थे; पानी नहीं आ रहा, या गंदा आ रहा है, तो उसे पकड़कर बीमार होगे — दूसरा नल देखो, क्योंकि नल निमित्त है। जब तक मेरा आत्मिक कल्याण नहीं होगा, एक नहीं हजारों गुरु बदलूंगा — क्योंकि गुरु एक ही होता है, शरीर अनेक; पृथ्वी से पानी एक ही जगह से आता है, नल अनेक हैं। मैं गुरु खोज रहा हूं, ना कि शरीर। गुरु ज्ञान का प्रतीक है — गु मतलब अंधकार, रु मतलब प्रकाश; जिसके अंदर आत्मा को प्रकाशित करने की क्षमता है, वो गुरु। "गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देव महेश्वर" — ब्रह्मा सृष्टिकर्ता: इस पिंड के सृष्टिकर्ता पिता को देखा; विष्णु पालनकर्ता: मां दो बार पालती है — एक बार संसार में आने योग्य बनाती है, एक बार मल-मूत्र साफ करके चलने-फिरने योग्य; महेश्वर संहारकर्ता। जो अपने जन्म-मरण से मुक्त हो जाए वो ब्रह्मा को पार कर गया, जो अपने पालन से भी मुक्त हो जाए वो विष्णु को पार कर गया, और जो अपना स्वयं का — अपने बनाए हुए अस्तित्व का — संहार कर दे, निर्विकार हो जाए, वो महेश को पार कर गया। ये तीनों को पार कर गया — "गुरु साक्षात परब्रह्म": पर मतलब परछाई, पर मतलब पार कराने वाला, पर मतलब परम ब्रह्म का स्वरूप हो गया; बस इतना फर्क है कि वो निराकार है, ये साकार। साकार में आना ही पड़ता है, क्योंकि बिना साकार के आप कुछ ग्रहण भी नहीं कर सकते — शब्द से कल्याण होना है; आपकी इतनी सामर्थ्य नहीं कि खुद निकल जाओ, इसलिए वो गुरु के रूप में आता है — "गुरु बिन ज्ञान ना हो"। लेकिन कौन सा गुरु? जो तीनों को पार कर गया हो; तीनों में से एक में भी अगर अटका है तो गुरु योग्य नहीं है।
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वीडियो: आत्मज्ञानी और ब्रह्मज्ञानी में क्या भेद है | मन क्या है / #आत्मज्ञानी #ब्रह्मज्ञानी #aadhyatmik · 2024-09-04