प्रश्नोत्तर P17-0085 · भाग 17
गुरु जी, इष्ट देव, कुल देवता, ग्राम देवता — यह सब सुनते तो बहुत हैं, पर आज तक समझ नहीं आया। इनका क्या अर्थ है?
अगर अपने आप को समझना है तब तो कुछ नहीं समझना है, समझने से भी मुक्त होना है; और अगर कुछ चाहिए तब इन्हें समझना है। इष्ट का चुनाव हम स्वयं करते हैं; कुल देवता का चुनाव हम नहीं करते — जिस कुल-खानदान से हैं, उस पीढ़ी ने किया है; ग्राम देवता का चुनाव गांव वालों ने और क्षेत्र देवता का पूरे एरिया वालों ने किया है। आत्मदर्शन वालों पर ये कोई नियम लागू नहीं होते, नियम से परे ही जाना है — आपने ईमानदारी अपना ली तो कौन सा नियम? जब कुछ नहीं चाहिए तो ना ईमानदारी रही ना बेईमानी। देवी-देवता "चाहिए" में काम करते हैं — जैसे समाज में बहुत दुकानें, व्यवस्थाएं हैं, जब चाहिए तब काम आती हैं; बस से जाना है तो ट्रेन की भीड़ से क्या मतलब। और हर जगह हमने अपने आप को पहले रखा है — "मेरी जरूरत पहले, तेरी बाद में"; मेरी सीट कन्फर्म हो गई तो कइयों को नहीं मिली इसका दुख नहीं — बात बस "मेरी" है, "मेरे" में सब जी रहे हैं।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: अद्भुत सत्संग ईश्वरी कृपा एकाकार / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-09-21