प्रश्नोत्तर P17-0147 · भाग 17
गुरु जी, मुझे उसकी दुनिया ठीक करने की जरूरत ही क्यों पड़ी थी? और आज हम अपनी ही दुनिया से भाग क्यों नहीं पा रहे?
आपने वहां से उसकी दुनिया देखी तो बड़ी दुखमय लगी — यहां आकर भी यही तो कर रहे हो, सबका दुख मिटाना चाहा; और जिसके दुख मिटाए, वही दुख का कारण बन बैठा। जितने लोग मिले, आपने अपने तरीके से उनका दुख दूर करना चाहा — मिला क्या? जिल्लत और अपमान, और उन्हें लगा कि हमने उन्हें यूज़ कर लिया। कहीं न कहीं वे सही भी हैं, क्योंकि दुनिया बसाने में आपने सबका उपयोग किया — मेरी दुनिया में ऐसे-ऐसे लोग होने चाहिए, जो मेरे विचारों के अकॉर्डिंग नहीं वे मेरी दुनिया में नहीं। इसीलिए अपनी दुनिया में अपने जैसी विचारधारा वाले ही मिलते हैं — चोर को चोर पसंद आता है, सत्संगी को सत्संगी। अब आप अपनी दुनिया से थक गए, रंक से राजा, राजा से रंक बनकर देख लिया, कोई मजा नहीं। यह पक्का है कि यहां आपके रहने-न-रहने से राई भर भी कुछ नहीं बदलता।
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वीडियो: मूल से मेरा हटना कैसे हुआ ? रविवार प्रश्नोत्तरी #योगी · 2025-12-21