प्रश्नोत्तर P18-0006 · भाग 18
गुरु जी, सच्चे ज्ञान-पिपासु के लिए इस मंडी में यह पहचानना बड़ा कठिन है कि सच्चा कौन है और झूठा कौन — वह क्या करे?
खोजी पक्का है तो उसे मिलेगा — मेरा अनुभव है कि वह वहीं रुकेगा जहां वह होगा जिसे वह खोज रहा था। तीन तरह के साधक होते हैं: अभाव में, कुभाव में और स्वभाव में। अभाव वाले राजसी प्रवृत्ति में चले जाते हैं — उन्हें धन, लग्जरी लाइफ चाहिए, क्योंकि जीवन में अभाव था। कुभाव वाले तांत्रिक बन जाते हैं, लोगों को गालियां देते, धमकाते हैं, क्योंकि झगड़ा करके घर से निकले हैं। स्वभाव वाला साधक कहता है मैं खोज करूंगा इससे आगे क्या है — वही ज्ञान को उपलब्ध होता है; बाकी दोनों संसार में घूमते रहते हैं। उसके पास जल्दी भीड़ नहीं लगती, क्योंकि भीड़ राजसी-तामसी में है; उसके पास वही पहुंचते हैं जिन्हें ज्ञान चाहिए। पवित्रता के सामने सबको झुकना पड़ता है — अगर आप में पवित्रता है तो एक न एक दिन आप परमात्मा तक पहुंच जाएंगे, पक्का। बस अपनी पवित्रता बनाए रखो। साधक का जीवन ऐसा है जैसे कोई कुंवारी लड़की अकेली समाज में निकले — पवित्रता बचाने वाले कम, अपवित्र करने वाले अनेक मिलेंगे। ज्यादातर लोग तंत्र-मंत्र में उलझकर या मुक्ति की ओर जाकर भी "कुछ बन बैठते" हैं।
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वीडियो: योगीजी की आत्मकथा अज्ञान से ज्ञान तक खोज में कुछ अनुभव की बातें ! #yogijikasatsang #pratyakshgyan · 2024-08-25