प्रश्नोत्तर P18-0028 · भाग 18
गुरु जी, जो गृहस्थ है और समाज में रह रहा है, संन्यासी नहीं — क्या उसके लिए यह मार्ग बहुत कठिन नहीं हो जाता?
मेरे व्यक्तिगत अनुभव से इस मार्ग में गृहस्थ के लिए आसान है, संन्यासी के लिए कठिन। (बने हुए नहीं, संन्यासी-स्थिति की बात कर रहा हूं) कोई संन्यासी तब बनता है जब उसे जगत में अपने से ज्यादा दुखी लोग दिखते हैं और वह उन्हें दुख से मुक्त करना चाहता है। अब वह काम नहीं कर सकता — खोज करे कि काम करे — और जो भी उसे भोजन कराता है, उसे कुछ चाहिए: एक वक्त की रोटी खिलाकर कहेगा "महाराज जी, कुछ उपाय बताओ, सट्टे का नंबर बताओ"। अगली रोटी तभी मिलेगी — बड़ी दुविधा है; संन्यासी के लिए बहुत ज्यादा ईमानदार रहना बड़ा मुश्किल है। जैसे कुंवारी स्त्री परिवार में सुरक्षित है पर अकेली निकले तो नहीं — वही संन्यासी की स्थिति है। गृहस्थ को अपने को ही तारना है, जगत को नहीं। मैंने परमात्मा से मांगा — ऐसा मार्ग देना जिसमें मैं भी न रहूं, बस तू, और सामने वाले को मेरी जरूरत न पड़े — प्रत्यक्ष मार्ग; इसलिए चैनल का नाम भी "आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान" है। मुझे समझ लिया तो मेरी जरूरत आपको नहीं।
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वीडियो: योगीजी की आत्मकथा अज्ञान से ज्ञान तक खोज में कुछ अनुभव की बातें ! #yogijikasatsang #pratyakshgyan · 2024-08-25