प्रश्नोत्तर P18-0044 · भाग 18
गुरु जी, हम अपने आप को इस प्रतीत (जगत) से अलग क्यों पाते हैं — अलगाव और अपूर्णता का कारण क्या है?
रात में कई जगह आसन बदलकर देखता था कि क्या है प्रतीत और क्या हूं मैं, मैं इससे अलग क्यों हूं। पता चला — अलगाव का कारण बस अपनी जरूरत है: मैंने अपने तरीके से अपनी जरूरत को "कुछ" समझ लिया और "है" में पूरी तरह फंस गया। मैं दृष्टा हूं, "है" परिवर्तनशील है, अपूर्ण है; मैं पूर्ण हूं। अब पूर्ण-अपूर्ण के चक्कर में फंस गया — अपूर्ण को पूर्ण करना चाहता हूं, उससे अपने को पूर्ण करना चाहता हूं, उसे स्थिर करना चाहता हूं, जबकि पता है कि वह स्थिर नहीं होगा। हमारी अपूर्णता बस इतनी है कि हम अपूर्ण से अपने आप को पूर्ण करना चाहते हैं; यह भाव छूट जाए तो आप स्वयं पूर्ण हो, बात खत्म। (साधक ने "पूर्णमदः पूर्णमिदं..." श्लोक को इसका प्रमाण बताया।)
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वीडियो: योगीजी की आत्मकथा अज्ञान से ज्ञान तक खोज में कुछ अनुभव की बातें ! #yogijikasatsang #pratyakshgyan · 2024-08-25