आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P18-0090 · भाग 18

गुरु जी, भगवान कृष्ण गीता में जब यज्ञ की बात करते हैं, तो उसका क्या तात्पर्य है — क्या वे कर्मकांड वाले यज्ञ की बात कर रहे हैं? इसका आध्यात्मिक सत्य क्या है?

यज्ञ का मतलब है अपनी इंद्रियों की आहुति दे देना। इंद्रियां कहां फंसी हैं — स्वाद के चक्कर में; आपने उन्हें स्वाद का आदी बना दिया है, उस स्वाद की आहुति दे देना। भोजन करते हो तो जठराग्नि जलती है; जब उसे आग की जरूरत होती है तो वह बाहर से खींचती है — इसलिए गर्मी में भोजन करते हो तो पसीने से भर जाते हो और ठंड में कांपने लगते हो। इसलिए कम भोजन करिए — जठराग्नि भोजन को जल्दी पका देगी और जलती रहेगी, तो पश्चाताप की आग जलने लगेगी। इंद्रियों के पीछे कौन है, आप किसके लिए व्याकुल हो — जैसे पहले नशा नहीं करते थे तो उसकी याद नहीं आती थी, नशा शुरू किया तो याद आने लगी; भटकाने वाले आप ही हो। अपने स्वाद की आहुति दे देना — इस यज्ञ की बात हुई है।

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वीडियो: आत्मज्ञान किस स्थिति में होता है ? #aadhyatmik_satsang #livesatsang #yogijikasatsang #pratyakshgyan · 2025-01-03