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प्रश्नोत्तर P18-0139 · भाग 18

गुरु जी, आदमी जब पूजा या सुधार की तरफ जाता है तो उसे विपत्तियों और तकलीफों का सामना क्यों करना पड़ता है?

क्योंकि वह सुधरने जा रहा है। पहले बिगड़ रहा था तो बिगड़ने वाले साथ थे, झुंड की ताकत थी, बेईमानों का साथ था, कोई तकलीफ नहीं थी। अब सुधरना चाहता है तो न सुधरने वाले उसके साथ हैं, न बिगड़ने वाले — वह झुंड से बाहर, अकेला हो जाता है। जैसे टिकट की लाइन — अपनी धीमी लाइन छोड़कर तेज वाली में गए, वहां खराबी हो गई; पुरानी में लौटना चाहो तो कहते हैं आखिर में लगो। आपने बेईमानी वाली लाइन छोड़ दी, और ईमानदारी वाले अभी अपनाएंगे नहीं — तो अभी आप कहीं के नहीं हो; बहुत तकलीफ और अकेलापन झेलना पड़ेगा। फिर जब वे देख लेंगे कि यह पक्का ईमानदार है, तो ईमानदार वाले आपको अपने झुंड में ले लेंगे। बेईमानी में रहना आदत के कारण ठीक लगता है, पर उसका परिणाम भयानक है; एक बार यह संघर्ष झेल लो, हमेशा के लिए निकल जाओगे — वहां तो सुख-दुख, सुख-दुख लगा ही रहेगा।

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वीडियो: जब मैं छोटे दायरे को तोड़ा ? / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-12-22