आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P18-0196 · भाग 18

गुरु जी, आपने ज्ञान बांटने का यह प्रण कब और क्यों लिया कि हर जगह, हर किसी को ज्ञान देंगे?

ज्ञान के पहले मैं अनेक गुरुओं के पास गया, उनके पास जा-जाकर रोता था, गिड़गिड़ाता था कि मुझे मार्ग बताओ, पर ज्यादातर जगह डांट मिलती थी — उस लेवल पर बैठे गुरु सीधी बात तक नहीं करते। जूनागढ़ में दत्तात्रेय मंदिर में (ऊपर सीढ़ियां चढ़कर) मना होने पर भी प्रतिमा छू ली — डांट पड़ी, मैंने कहा जो दंड हो दो, पवित्र को छूने का भाव था। आश्रमों में देखता था कि ये लोग मात्र पैसों के लिए आत्माओं को भटका रहे हैं, तो रोता था। तभी भाव बनाया कि मुझे घुमा-फिराकर नहीं, प्रत्यक्ष मार्ग चाहिए, और जिस दिन आत्मज्ञान हुआ उस दिन गली-मोहल्ले, रोड पर, गटर के पास, शौचालय के सामने भी ज्ञान दूंगा। मुझे आनंद नहीं चाहिए — लाखों-करोड़ों लोगों को उपलब्धि हो, तब इस ज्ञान के मिलने का मतलब है। इसलिए सुबह से रात दो-दो बजे, कभी अगली सुबह तक सत्संग करता हूं; शरीर साथ न दे तो भी उसका उपयोग करता हूं — एक-एक शब्द के लिए मैं तरसा था, आज वे मेरे काम के नहीं, आपके काम के हैं।

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वीडियो: स्वाभाविक आत्मा का गुण क्या है / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-09-29