प्रश्नोत्तर P19-0065 · भाग 19
गुरु जी, प्रत्यक्ष ज्ञान में सब प्रत्यक्ष है, पर परमानंद का अनुभव वहां पहुंचे बिना नहीं — ये अप्रत्यक्ष संशय कैसे टूटे?
प्रत्यक्ष ज्ञान कहता है तू जहां है अगर दुखी/निराश/राग-द्वेष/घुटन है तो वहां रह के क्या करेगा? पहले ये छोड़ — खुद परेशान है तभी छोड़ेगा। रिस्क भी नहीं क्योंकि जहां हूं परेशान ही हूं; संसार में और सुख का ऑप्शन नहीं। दो ही रास्ते — संसार या परमानंद; एक जी लिया, दूसरा देख ले आनंद है या नहीं — दोनों क्लियर तो पूर्ण। लालच में कहीं मत जाना चाहे आनंद/परमानंद का। प्रत्यक्ष ज्ञान आश्वासन नहीं देता — कहता है जहां हो ठीक हो तो रुक, नहीं तो निकल। तू क्या मानता है वहां से निकालेंगे; दबाव-संकोच में ज्ञान नहीं। तुरंत की बात — अतीत/भविष्य नहीं। तू तैयार हो तो दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती।
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