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प्रश्नोत्तर P2-0123 · भाग 2

बचपन से सिखाया जाता है कि होली इसलिए मनाते हैं कि हिरण्यकश्यप खुद को सर्वेश्वर मानता था; उसका बेटा प्रह्लाद परमात्मा को मानता था, तो उसने उसे बहुत यातनाएं दीं, और अंत में बहन होलिका (जिसे आग में न जलने का वरदान था) प्रह्लाद को लेकर आग में बैठी, पर होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गया; अगले दिन रंग खेलकर सत्य की जीत मनाते हैं। लेकिन आज होली बस परंपरा, उपले जलाकर चक्कर लगाने, और धुलंडी में रंग-डीजे की मौज-मस्ती बनकर रह गई है; असली मतलब खो गया है। होली मनाने का मूल अर्थ क्या है, और क्या हम आज इसमें कुछ नया कर सकते हैं?

आप होलिका दहन में देखिए — एक बुराई का नाश हो जाता है और भक्त बच जाता है। यही है। तो हमें अपनी बुराई का नाश करना है, अपने बुरे काम छोड़ने हैं, पूरी तरह ईमानदारी अपनानी है; तब हमारे जीवन में होली का महत्व है। उस होलिका दहन में दो लोग बैठते हैं — बुआ और प्रह्लाद। अंदर वाला, यानी गोद वाला, बच जाता है, और बाहर वाला जल जाता है। तो हमने बुराइयां बाहर से धारण की हैं; अगर देखा जाए, तो बुरे हम नहीं हैं — देश, काल, स्थिति-परिस्थिति में हमने उन्हें धारण किया है। तो उनका त्याग कर देना चाहिए; शेष बचेगा सत्य। बुराइयां तुरंत छोड़ देनी चाहिए, और जितनी बुराइयां हमने की हैं, उन्हें पश्चाताप की आग में जलाकर राख कर देना चाहिए। तब हमारे जीवन में होली का मतलब है।

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वीडियो: होली योगी जी के संग #योगी · 2026-03-04