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प्रश्नोत्तर P2-0163 · भाग 2

योगी जी, कई गर्भवती माताएं भी ऐसी फोटो सामने लगा लेती हैं और कहा जाता है कि जैसी फोटो देखोगी, वैसा बच्चा होगा, बार-बार याद करने से बच्चे में वे गुण आ जाते हैं। क्या वह काम नहीं करता?

वह माता क्या कर रही है, उसका आत्मिक चिंतन क्या हो रहा है — वह मायने रखता है। सिर्फ आंखों से देखने से होता, तो हर गर्भवती को राजा या महात्मा का ही चित्र दिखाया जाए और हर बच्चा राजा या महात्मा बन जाए — ऐसा नहीं होता। उस माता का कर्म क्या है, वह जीती कैसे है? क्योंकि जैसे जिएगी, जैसा करेगी, वैसे ही विचार आएंगे; चित्र वाला विचार तो (बाहर से) डाला हुआ है। वह मानसिक रूप से कहां केंद्रित है, किसमें जी रही है — मायने यह रखता है। तो अगर हम किसी से प्रभावित हो रहे हैं और वैसा बनना है, तो उसके लिए वैसा काम करना पड़ेगा। चित्र एक प्रेरणा का केंद्र है, लेकिन चित्र में ही लिप्त नहीं होना है। दो व्यक्ति हों — एक ने राजा का चित्र लगा दिया और बस देखता रहा; दूसरे ने राजा के गुण समझे और उनके लिए पूरी मेहनत की। मौका मिलने पर राजा किसे चुना जाएगा? काम करने वाले को, क्योंकि गुण से वह राजा बना है, और गुण लाने के लिए काम करना पड़ता है। पानी या भोजन का चित्र देखने से प्यास-भूख नहीं मिटती; पेट भरने के लिए भोजन पकाना पड़ेगा। सीधी बात — मेहनत करनी पड़ेगी।

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