आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P2-0170 · भाग 2

कई गृहस्थ माताएं-बहनें हैं जिनके बच्चे और पति उन्हें पूरी आजादी देते हैं, काम के लिए नौकर भी रख देते हैं, कि आप पूरी तरह अध्यात्म में रहो; फिर भी वे आधा समय वैराग्य और भगवान की बातें करती हैं और आधा समय घर के हर काम में दखल देती हैं — बहू क्या कर रही है, रसोई में तेल-घी ज्यादा क्यों। घर वाले भी दुखी हो जाते हैं। ऐसा व्यक्ति अगर मेरे परिवार में हो, तो हम उसके लिए क्या कर सकते हैं?

उसके हाल पर उसे छोड़ दो, और तुम निकल लो — तुम तो अपना कर लो। ऐसा न हो कि वह नहीं समझ रहा और उसे समझाने में तुम्हारी जिंदगी चली जाए; आखिर में तुम्हारी जिंदगी भी गई, और दोनों एक ही जगह पहुंचोगे। अगर सालों से नहीं चल रही, तो इसका मतलब उसे चलना ही नहीं है। जिसे चलना है, वह चलेगा — एक बार में ही पकड़ लेगा। मैं आपको घटना बताता हूं। मेरे ज्योतिष के गुरु जी थे; वे पहले कई बार आश्रम जा चुके थे। मैं पहली बार उनके साथ ऐसे ही गया, मुझे अच्छा लग गया और मैं संन्यासी हो गया। इसका मतलब मेरे अंदर कहीं न कहीं वह छिपा हुआ था, जो देखकर जागृत हो गया कि मुझे भी ऐसा जीवन चाहिए, क्योंकि इस जीवन में परमात्मा है, आनंद है; मुझे बचपन से फकीर बनने का बड़ा शौक था। वे अभी भी अपनी जगह ही हैं — ज्योतिष से कथावाचक बन गए। मुझे अध्यात्म में एक व्यक्ति भी नहीं लाया; अध्यात्म का एक शब्द भी मुझे किसी ने नहीं बताया। इस मार्ग पर लाने वाला, इस लक्ष्य पर पहुंचाने वाला एक ही व्यक्ति है — वह मैं हूं। एक व्यक्ति ने भी मुझे पूरी तरह सपोर्ट नहीं किया; चाहे अध्यात्म के शब्द हों या जगह, सारी व्यवस्था मैंने की। मेरे अंदर वह था, और मैंने पूरा समय, पूरी ताकत इसी में लगा दी। इसलिए कह रहा हूं — अपना समय बर्बाद मत करो। एक-दो बार कह दो कि मुझे यह बात समझ में आई है, तुम्हें भी समझनी है तो पकड़ लो; बाकी तुम्हारी मर्जी, तुम्हारा जीवन तुम्हारे हाथ में। तीसरी बार मत कहो। (मैं भी) उसी घर में रहकर अध्यात्म की तरफ पूरी तरह बढ़ गया।

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वीडियो: मेरे भाव को तू योगी ही समझ सकता है । #योगी · 2026-01-20