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प्रश्नोत्तर P2-0182 · भाग 2

आदमी ठान तो लेता है, पर पहली यात्रा में उसे पता नहीं होता कि रास्ता कितना दुर्गम होगा। क्या आपको अपने बलबूते पर ऐसा अटूट विश्वास था कि जब ये (पहले वाले) पहुंचे हैं, तो मैं भी पहुंचूंगा, शर्तें कुछ भी हों?

हां — ये पहुंच सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं? पहुंचने से पहले ये भी मेरे जैसे ही थे, तो मैं भी पहुंच सकता हूं। चलने से पहले ही पता था कि पहुंच जाऊंगा, क्योंकि मैं उसके लिए कुछ भी कर सकता था। मैं कहीं फिक्स नहीं था — अगर कोई कहे कि तुम्हारा लक्ष्य इस तरफ है, तो उधर चल देता; मेरी खोज मुझे जहां ले जाए, चल लेता था, चाहे कांपता रहूं, चाहे डरता रहूं। किसी पर संशय भी नहीं होता था, क्योंकि अपने पास कुछ था ही नहीं। चोर का डर कब? जब जेब में कुछ हो। लोग कहते — यहां क्या कर रहा है, चोर आएगा, लूट लेगा; मुझे पता था कि चोर आ भी गया, तो मेरी सहायता ही करके जाएगा, क्योंकि मेरे पास कुछ नहीं है। तो डर-भय मुझ पर काम नहीं करता था। कहां जाओगे, कौन है तुम्हारा? जहां से आए हो, वहां क्या है, यह तो समझ ही चुके हो। मेरा बस यही भाव था — पहला और आखिरी। अगर ज्ञान के साथ नहीं हूं, तो इस अज्ञानता में जीना नहीं चाहता। बस इतना था कि जिस मार्ग पर चल रहा हूं, उसका जिम्मेदार मैं हूं; मेरी वजह से किसी को तकलीफ नहीं होनी चाहिए, मुझे हो रही है तो कोई बात नहीं। जहां था, वहां क्या था? यहां कम से कम आशा की किरण फूटी है, पता चल गया कि कहां चलना है, मंजिल नजदीक आ रही है; वहां तो शुरुआत ही नहीं थी। अगर मेरे प्राण भी खोज में जाएंगे, तो हंसूंगा और कहूंगा — देख जिंदगी, तेरे लिए गई।

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वीडियो: मेरे भाव को तू योगी ही समझ सकता है । #योगी · 2026-01-20