आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P2-0191 · भाग 2

अपनों की कुटिया के नंबर पर ऐसे फोन भी आते हैं कि 90-90 साल के संन्यासी, जो उम्रभर एक मार्ग पर चलते रहे (फिर भी कहीं नहीं पहुंचे) — ऐसा क्यों?

वे चले ही नहीं, बस चाटते रहे। चले होते, तो लक्ष्य तक पहुंच गए होते। जिनके बताए लक्ष्य पर हम चल रहे हैं, अगर वे कुछ सालों में पहुंचे, तो हम भी कुछ सालों में, बल्कि उनसे कम में पहुंचते। हम बस चलने का नाटक कर रहे थे, चल कहीं और रहे थे। उम्र चाहे 90 की हो या 100 की, उससे क्या फर्क पड़ता है? वे कामनाओं में चले, मान के चक्कर में चले। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो समाज में मेहनत करके नहीं खा सकते थे, तो इसी मार्ग पर चल देते हैं, खा-पीकर मजा लेते रहते हैं और बाद में पछताते हैं; उन्हें अध्यात्म का मतलब ही नहीं पता। वे जहां के लिए चले थे, वहीं हैं। यह मेरी जिंदगी का अनुभव है: आप जहां हो, वहीं के लिए चले हो; और जहां हो, वहीं से आपका लक्ष्य दिखता है। ऐसा नहीं कि हाथी के दांत — खाने के और, दिखाने के और; लक्ष्य कुछ बता रहे हो, और चल कहीं और रहे हो।

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वीडियो: आखिर कब तक ये याद रहेगा ? #योगी · 2026-01-16