प्रश्नोत्तर P21-0077 · भाग 21
गुरु जी, कोई हम पर विश्वास करके अपना काम लेकर आता है जो हमसे नहीं, किसी और के द्वारा होना है। स्पष्ट मना करें तो वह टूट जाएगा, इसलिए उसे थोड़ा आश्वासन दे देते हैं — हम तो इसे सत्कर्म समझकर कर रहे हैं, पर काम न हुआ तो क्या हम उसके पाप के भागीदार बनते हैं?
इसे सत्कर्म नहीं कहते, इसे समाज सेवा कहते हैं; सत्कर्म उसे कहते हैं जैसे कोई गिर गया, आपने उठा दिया। जब तू कर ही नहीं सकता तो उसे आश्वासन क्यों दे रहा है? या बोल दे मैं उस लायक नहीं, किसी के द्वारा करवाऊंगा। वो टूटेगा तब जब झूठा आश्वासन मिलेगा। अभी टूट जाए तो अच्छा, बाद में तो टूटेगा ही — क्योंकि तू आश्वासन देगा तो उसके सारे ऑप्शन खत्म हो गए; तू अभी बता देता तो और भी ऑप्शन बचते। सामने कोई भी काम ले आया — अगर मैं कर सकता हूं तो बोलूं मैं उस लायक हूं, होगा नहीं होगा मुझे पक्का नहीं; अगर उस लायक नहीं हूं तो बता दूं कि मैं उस लायक नहीं, लेकिन कोई है उसके द्वारा करवाऊंगा; और अगर कोई ऑप्शन नहीं है तो कहूं, मैं एक बार प्रयास करूंगा, हो गया तो ठीक, नहीं हुआ तो ठीक। तब काम हो या ना हो, वो आशीर्वाद ही देगा कि प्रयास तो किया; लेकिन तूने कहा मैं करवा दूंगा, तो होगा तो आशीर्वाद, नहीं होगा तो श्राप देगा। आश्वासन देने की स्थिति ये है कि आप लायक हो; तब नहीं हुआ तो वो प्राकृतिक है — आप आश्वासन देने में ईमानदार हो, बस।
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