प्रश्नोत्तर P21-0111 · भाग 21
गुरु जी, कहते हैं नकारात्मक ऊर्जा और सकारात्मक ऊर्जा होती है, पर मैं सोचता हूं ऊर्जा तो सिर्फ ऊर्जा है, सात्विक — और जो ऊर्जा मुझे मिली है उसका आधार मेरे कर्म हैं। क्या ऐसा समझूं?
हां, आपके कर्मों से वो पॉजिटिव-नेगेटिव बनती है। जैसे जहर — किसी को विषैले जानवर ने काटा, उसे जहर दिया जाता है और वो ठीक हो जाता है, उसके लिए पॉजिटिव है; पर जिसे नहीं काटा उसे वो जहर दे दो तो नेगेटिव — जहर तो सिर्फ जहर था, आपने कहां और कैसे उपयोग किया। ऊर्जा सिर्फ ऊर्जा है, पूरा ब्रह्मांड ऊर्जा में है — आप इसमें से कितनी ऊर्जा लेते हो और कहां उपयोग करते हो, यह महत्वपूर्ण है, और उससे ऊर्जा बढ़कर लौटती है। दो आदमी दिन भर कमाए — एक ने जाकर शराब पी ली, उसकी ऊर्जा खत्म, शरीर का नुकसान, सामाजिक स्तर भी गिरा; दूसरे ने राशन लिया, परिवार का भरण-पोषण किया — एक ने ऊर्जा से ऊर्जा बढ़ाई, एक ने अपने आप को गिराया। जैसा बीज लगाओगे वैसा कई गुना फल मिलेगा। ऊर्जा नमक की तरह, पानी की तरह सबमें घुल जाती है — ऊर्जा सात्विक होती है; आपने जैसा उपयोग किया, राजसी या तामसी, उस तरीके से कई गुना रिटर्न मिलता है।
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