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प्रश्नोत्तर P21-0132 · भाग 21

गुरु जी, मानव जन्म में हम बुरा ही ज्यादा क्यों सोचते हैं, अच्छा क्यों नहीं सोचते?

ऐसा नहीं कि आप बुरा ही सोचते हो — अच्छा भी तो सोचते हो, दोनों सोचते हैं। मानव के अलावा किसी शरीर में कर्ता का अधिकार नहीं है, सब अपने स्वभाव में जीते-खाते हैं। मानव शरीर में तीन प्रवृत्तियां हैं — सात्विक, देव और राक्षस; और इसमें भोग-योग दोनों हैं, बाकी शरीरों में सिर्फ भोग है, योग नहीं। तो हमें अच्छा सोचने का भी मौका है, बुरा भी — दोनों की स्वतंत्रता है: आप राक्षस भी बन सकते हो, देव भी, और एक स्वतंत्रता ये कि उस परम आनंद को उपलब्ध हो सकते हो, बनने से मुक्त हो सकते हो। अन्य जितने भी जीव हैं उनका एक दायरा है, उस शरीर के हिसाब से जिएंगे, उस दायरे को कभी तोड़ नहीं सकते; मनुष्य दायरा बांध भी सकता है, तोड़ भी सकता है, और तोड़कर मूल परम स्थिति को उपलब्ध हो सकता है। हमारी क्षमता पूरी स्वतंत्र है — ज्यादा गिर भी सकते हैं, ज्यादा उठ भी सकते हैं। पशु ना अच्छा सोचते ना बुरा — भूख लगेगी तो छीनकर भी खा लेंगे, भूख नहीं तो मुंह पर रख दो नहीं खाएंगे; इसलिए उन्हें दोष नहीं लगता।

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वीडियो: मुझे कहां होना है ? कलबुर्गी कर्नाटक में पुनः सत्संग 12 जुलाई 2026 #योगी · 2026-07-14