प्रश्नोत्तर P3-0011 · भाग 3
कल्पना में अध्यात्म शुरू किया हो, पीछे आसक्ति-मोह कैंची से नहीं कटती, सुरक्षित महसूस किया था — तो क्या कल्पना में चलते-चलते भी परम स्थिति पक्की हो सकती है? आपके व्यवहार में करुणा-कृपा देखकर क्या मेरा भी वहां पहुंचना हो सकता है, चाहे शुरुआत कल्पना से हो?
हो सकता है — तब हो जाएगा जब आप अपने तरीके से पाने की इच्छा का त्याग करोगे। जैसे वो व्यक्ति मिला तो बदलना चाह रहा था; अंदर डर था, पश्चाताप है; मेरा काम है तुम बदल जाओ, कल्याण हो जाए — तब तैयार है।
आप भी चाहो तो परम स्थिति में आ सकते हो; ये कोई बहुत बड़ी बात नहीं। आपके चाहने से ही होगा। जैसे मोबाइल — नेटवर्क तेज हो, फ्लाइट मोड में स्वीकार न करो तो नेटवर्क नहीं आएगा; फ्लाइट मोड हटाओ तो दूर का भी पकड़ लेगा। स्वीकार करना पड़ेगा। परम स्थिति में पहुंचना चाहती हो तो प्रकृति मदद करेगी; फ्लाइट मोड डाल रखा तो कौन मदद करेगा?
प्रकृति = जो सामने दिख रहा, महसूस हो रहा। अनेक रूप में आकर मदद करती है। कांटे से कांटा निकाल भी सकते हो, और चुभा भी सकते हो — प्रकृति को लेना-देना नहीं। 200 कमाए — दूध पिओ या शराब; जैसी ऊर्जा, वैसी प्रकृति वैश्य भेजती है। जहां खर्च करोगे वैसा बन जाओगे। प्रकृति के लिए ना अच्छा ना बुरा। शरीर भी प्रकृति है — नकार कैसे?
ऊर्जा जितनी है उतना देती है। ऊर्जा ईमानदारी से इकट्ठी या बेईमानी से — धन, तन, समझ। ईमानदारी से आत्मिक स्तर उठेगा; बेईमानी से गिरेगा। खर्च कहां कर रहे हो — पूरी जांच करो; जहां खर्च करूंगा उससे मिलेगा।
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वीडियो: मेरी समझ कैसे पक्का करूं ? #योगी · 2026-01-08