प्रश्नोत्तर P3-0017 · भाग 3
परमहंस जी और आपने काली मां को इष्ट बनाकर प्रकट अनुभव किया; मेरी मंदिरों में श्रद्धा कम (भीड़), कभी इष्ट नहीं बनाया — हनुमान चालीसा लिखा फिर छूट गया। क्या आत्मज्ञान/अपने घर मुड़ने की यात्रा में इष्ट अनिवार्य है, या बिना इष्ट भी संभव? भाव न आए तो बनाएं कैसे?
ऐसा नहीं कि क्रॉस किया — आपका वो हो गया। जैसे स्कूल टैलेंट देखकर क्लास स्किप कर देता — आपको इष्ट की जरूरत नहीं। इष्ट के बाद भी गुरु चाहिए। कबीर इष्ट नहीं बनाए, गुरु के इष्ट थे — कबीर को सीधा गुरु मिले। वाल्मीकि, अंगुलिमाल — सीधा गुरु। बुद्ध बहुत भटके। भाव आ रहा हो तो वो क्लास पढ़ रहे — इष्ट द्वारा गुरु मिलेगा। पार कर गए उन्हें सीधा गुरु।
मूल गुरु चाहिए — ज्ञान का प्रतीक। इष्ट से भी मुक्त होना पड़ेगा तभी उपलब्धि। इष्ट निमित्त गुरु तक पहुंचाने में; आपको सीधा गुरु मिल गया। गुरु व्यक्ति विशेष नहीं — मार्ग बताए, संशय निवारण, हर प्रश्न का प्रत्यक्ष उत्तर, भ्रम मिटाए। हनुमान चालीसा से सहारा लिया — तरीका अपना। मूल ज्ञान चाहिए, प्रश्नों के उत्तर — उत्तर मिलेंगे तभी खाली। गुरु खाली करता है, प्रश्न का बोझ निकालता है; प्रश्न निकालना आपकी मेहनत। व्याकुल-तड़प पर सहायता; जिज्ञासा रखो। सूक्ष्म प्रश्न निकालने को सत्संग सहारा — जीवन में सबसे जरूरी सत्संग।
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