प्रश्नोत्तर P3-0086 · भाग 3
दुकान वाली बात तो ठीक, पर हम गृहस्थ में परिवारजनों के बीच रहते हैं, जहां तन-मन-धन तीनों तरह से लेनदेन चलता ही है। अगर हम उन्हें धन से सपोर्ट करते हैं तो उम्मीद रहती है कि वे लौटाएं, पर मांगते नहीं बनता और घुटन होती है। ऐसे हिसाब-किताब से कैसे निकलें?
देने से पहले बात कर लो कि वापस कब दोगे। अगर रिश्ता ऐसा है कि बोल नहीं सकते, तो इतना दो जितना वापस न मिले तो भी कोई बात नहीं। आप व्यवहार कर क्यों रहे हो — इसलिए कि जरूरत पड़ने पर वह भी मेरे काम आएगा, या बस उसके लिए कर रहे हो? अगर उसके लिए कर रहे हो तो उतना ही करो कि वापस न दे तो कोई बात नहीं — न मिलने के लिए दो। और अगर ज्यादा दे रहे हो तो देने से पहले बोल दो कि कब दोगे।
कुछ न कुछ तो उम्मीद है। अनजान को तो उतना ही दोगे — लौटे न लौटे कोई बात नहीं, न लौटने के लिए दोगे। लेकिन जहां आपका रिश्ता है, उस रिश्ते को बनाए रखने के लिए दे रहे हो, तो उतना दो जितने में रिश्ता बना रहे। थोड़ा भी ज्यादा जाता है तो तकलीफ होने लगती है — तो फिर मत दो। अब देखो रिश्ता ज्यादा महत्वपूर्ण है कि पैसा। दो में से एक कम होगा आपके पास। अगर सामने वाला ऐसा है कि पैसा देंगे तो वापस नहीं आएगा, तो आप पैसा रखकर खुश होगे कि रिश्ता बनाकर? रिश्ता बनाए रखना है तो पैसा जाने दो, क्योंकि उस रिश्ते से कहीं न कहीं वह कुछ दे तो रहा है आपको। और अगर रिश्ता रहे या न रहे कोई फर्क नहीं पड़ता, तो उतना दो जितने में चल जाए।
रिश्ते में देना सत्कर्म नहीं है। सत्कर्म जरूरतमंद के लिए होता है — जहां यह भी न पता चले कि इसका उपयोग कौन करेगा। जैसे यहां पेड़ लगाए जा रहे हैं, व्यवस्था बन रही है — कौन उपयोग करेगा, कितने दिन करेगा, कोई बता सकता है? यह सत्कर्म है। अगर काम के पहले मुझे चेहरा पता है कि कौन इसका उपयोग करेगा, तो वह सत्कर्म नहीं — वहां मान-सम्मान की बात है। भोजन बनाने के पहले पता है कौन खाएगा, तो वह सत्कर्म नहीं।
व्यवहार में रहकर लेनदेन तो करना पड़ेगा। तो देखो आपके लिए जरूरी क्या है। अगर व्यक्ति ऐसा है कि लेता है देता नहीं, उसकी आदत ही ऐसी है, और वह रिश्ता बनाए रखना है, तो देते रहो — क्योंकि वह पैसे पर ही टिका हुआ है; रिश्ते की बुनियाद पैसा है। पैसा देना बंद तो वह चला जाएगा, फिर आप उसके बिना रह न पाओ, घुटन हो, बेचैनी हो। आखिरी में तुम ही बचने वाले हो — यहां सब खत्म हो जाएगा, चाहे रिश्ते हों, नाते हों, वैभव हो, तुम्हारी ताकत हो। तुम ही बचोगे; वही बोध है, वही ज्ञान है। तुम्हारे पास कोई भी ताकत है तो उस ताकत का एक दायरा है; जिसका दायरा है वह अपूर्ण है, परिवर्तनशील है। अगर आप किसी ताकत में लिप्त हो तो उपलब्धि नहीं है; उपलब्धि तभी होगी जब आपके पास आपके अलावा कुछ नहीं होगा। इसीलिए मैं कहता हूं सत्कर्म में लग जाओ — सब कुछ देकर ही सब कुछ मिलता है। और सब कुछ का कोई दायरा नहीं होता; हो सकता है किसी के पास एक ही हो तो उसके लिए वही सब कुछ है — तुलना मत करना, सबकी सामर्थ्य शरीर की, वैभव की, समझ की अलग-अलग है।
अब देखो आपके लिए जरूरी क्या है — रिश्ता, पैसा या दोनों। अगर दोनों जरूरी हैं और सामने वाले का व्यवहार ऐसा है कि लेता है देता नहीं, तो धीरे-धीरे वह आपको बेईमान बना देगा; बनना ही पड़ेगा, क्योंकि उसकी मांग इतनी है कि आप देना नहीं चाहते और उसे अपने पास रखना भी चाहते हो। इससे अच्छा तो खुलकर जियो — रिश्ता रहे चाहे न रहे। रिश्ते को बनाए रखने के लिए बेईमान मत बनो।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 14 जून 2026 #योगी · 2026-06-14