प्रश्नोत्तर P3-0091 · भाग 3
(उसी साधिका का प्रश्न) परम सत्ता तक कब पहुंचेंगे — मंजिल कितनी दूर है?
चले हैं तो पहुंचेंगे जरूर। मंजिल न तो पास है न दूर है। यह ऐसी मंजिल है — आत्मज्ञान की — जैसे ही आप विकारों से मुक्त होंगे, उपलब्ध हो जाएगी। मंजिल दूर तो मोक्ष की हो सकती है कि भैया लेनदेन पूरा होगा तो मोक्ष होगा; लेकिन आत्मज्ञान न पास है न दूर। इसीलिए कहा गया है कि आप तेजी से प्रयास करो। यह कभी भी, कहीं भी — जैसे ही राग-द्वेष की प्रतिक्रिया होना बंद हुई और पीछे का मोह खत्म हुआ, उपलब्धि हुई।
मेरा आखिरी द्वेष वही था जब उन महाराज जी ने मुझे मारा था — मुझे लगा मैं मारूंगा तो बुढ़ापे में हड्डियां नहीं बचेंगी। वह मेरा आखिरी द्वेष, आखिरी क्रोध था, लेकिन मैंने शरीर से प्रतिक्रिया नहीं दी, मैंने उसे देखा। राग, लगाव, मोह पहले खत्म हो गया था; द्वेष वही बचा था, वह खत्म हुआ और कुछ ही समय बाद ज्ञान हो गया।
जैसे ही राग और द्वेष बनना बंद होगा — यह विपरीत परिस्थितियों में पता चलेगा, अनुकूल में नहीं; विपरीत परिस्थितियां पैदा होंगी, उसकी जांच होगी — और जांच में अगर आप पास हो गए तो उसके बाद ही अवधूत स्थिति होती है, और उसके कुछ ही समय बाद आत्मा का बोध हो जाएगा जिसे आत्मज्ञान कहते हैं। मंजिल तुम्हारे अंदर है, तो दूरियां कहां हैं? पिछले मोह से, राग-द्वेष से ही विकार है; राग-द्वेष का बनना बंद हुआ और पिछला खत्म हुआ, तो अवधूत स्थिति आ जाएगी। अगर बाहर होती तो मैं पास या दूर कह देता; मंजिल तो मुझ में ही है, इसलिए यह न पास है न दूर है।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 14 जून 2026 #योगी · 2026-06-14