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प्रश्नोत्तर P3-0131 · भाग 3

(लाइव) आपने कहा प्रकृति आपकी हर बात समझती-सुनती है (जैसे चिड़िया बनने की इच्छा)। तो जो पूरा ईमानदार नहीं है, अभी भी अपने जाल में व्यस्त है और कई इच्छाएं व्यक्त कर रहा है — क्या प्रकृति उसकी इच्छाओं को भी मान्यता देगी?

आप अच्छे हो या बुरे, प्रकृति को इससे मतलब नहीं है। प्रकृति का काम है तुम्हें देना, बस बात खत्म — वह ईमानदार है या बेईमान, उससे कोई मतलब नहीं। आप उस लायक हो गए, लो — योग्य होना है; योग्य होगे तभी मिलेगा। जैसे फूल वाले का काम है फूल बेच देना — पैसा दे दिया, फिर आप फूल चाहे मय्यत पर ले जाओ, चाहे भगवान के चरणों में, चाहे प्रेमी-प्रेमिका को दो, चाहे गटर में फेंक दो — उसे कोई मतलब नहीं। फूल प्रकृति से आया, प्रकृति में मिल जाएगा। बीच में हमने फालतू अपना भाव डाला — तुम अच्छे-बुरे में फंसे हो; प्रकृति के लिए न अच्छा है न बुरा। तुम लायक हुए, तुम्हें दे दिया। जैसे तुम्हारी योग्यता देखकर गवर्नमेंट ने बंदूक दे दी; आपने गलत उपयोग किया तो छीन ली जाएगी — पावर का मिसयूज करते हो तो छीन लिया जाता है। प्रकृति ऐसे ही काम करती है। योग्यता से ज्यादा जब भी इतिहास में किसी को कुछ मिला है, उसने अपने आप को बर्बाद किया है। योग्यता नहीं और आपको ऑफिसर बना दिया, तलवार-बंदूक दे दी, चलाना नहीं आता और युद्ध के मैदान में कूद गए — फिर क्या होगा? सामने वाला यह थोड़े पूछेगा कि तुम्हें चलाना आता है कि नहीं। इसलिए भैया, योग्यता से ज्यादा जब भी मिले तो ना कह दो — हमें नहीं चाहिए, बर्बाद हो जाएंगे; जरूरत भी देख लो। हमें लोग कपड़े देते हैं, मैं कहता हूं — बाबा, हम नए कपड़े संभाल नहीं पाएंगे, रखो अपने पास, हम इसी के लायक हैं। पहले जब घूमता था तो लोग पैसे देते थे कि धर्म पर खर्च करना — मैंने कहा ना बाबा, हमसे नहीं होगा; पहले भूख मुझे लगी तो मैं खाऊंगा कि किसी और को खिलाऊंगा? मैं तो खोज में निकला हूं, भूखा थोड़े ढूंढ रहा हूं; मुझे जितना चाहिए मिल जाता है, आप धर्म में खर्च कर देना। मैं सब खा गया, तभी यहां पहुंचा — मेरे पास कुछ होता तो मैं यहां थोड़े होता। तभी लोगों ने मुझे छोड़ दिया — मुझे किसी को छोड़ना नहीं पड़ा; जिसके पास कुछ नहीं, उसे कौन पूछेगा? काम के रहोगे तब तक पूछेंगे। लेकिन आप अपने आप से बहुत प्रामाणिक, ईमानदार रहो — यह ढूंढना है।

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