प्रश्नोत्तर P3-0143 · भाग 3
(लाइव) सत्कर्म से आत्मज्ञान कैसे पॉसिबल है?
इसलिए पॉसिबल है — समझिए। सर्वप्रथम ईमानदारी, उसके बाद सत्कर्म। जैसे आपने ईमानदारी पकड़ी, तो बंधन बंधना बंद हो गया। अब जितना आपने किया है, वह किसी और के साथ ही किया है — किसी जीव, किसी व्यक्ति के साथ; कहीं न कहीं उसे सताया है, तभी तो बंधन बंधा। अब सत्कर्म किसके साथ करोगे? जरूरतमंद के साथ — पता नहीं कौन मिलेगा। तो उसकी अंतरात्मा से आपके लिए आशीर्वाद निकलता है, तो पिछला बहुत तेजी से खत्म होता है। इसलिए सर्वप्रथम ईमानदारी, उसके बाद सत्कर्म — सबसे तेज है।
सोचो जरा, आपको आशीर्वाद कौन दे रहा है? उस समय जरूरतमंद व्यक्ति कामनाओं में नहीं रहता, इच्छा-अपेक्षा से परे रहता है, अपने आप में होकर आपको आशीर्वाद दे रहा है। उस समय के लिए आप उसके लिए भगवान हो, और वह अंतरात्मा से आपको आशीर्वाद दे रहा है। भगवान को आशीर्वाद देने वाला कौन है? परमात्मा। इसीलिए मेरा कहना है कि ईमानदारी-सत्कर्म सबसे तेज है — कोई साधना करो चाहे न करो, सीधा परमात्मा आपको आशीर्वाद दे रहा है।
सत्कर्म फल की तरह होता है और सेवा बीज की तरह। फल को आप खा भी सकते हो, लगा भी सकते हो, अनेक लोग सालों-साल खाएंगे; अनाज को या तो खा सकते हो या लगा सकते हो, दोनों नहीं। तुमने अगर सत्कर्म कर दिया तो आने वाली पीढ़ी भी उसका उपयोग करती है — इसका बंधन ही नहीं है।
(एक साधक ने कोरोना में रोज भोजन बांटने का अनुभव बताया — जिस दिन नहीं गए, जरूरतमंद राह देख रहा था।) ईमानदारी — सीधा परमात्मा आपको आशीर्वाद दे रहा है। जरूरतमंद तक लेकर जाओ — इतनी तो समझ है। अब कौन सी साधना करोगे? इसीलिए मेरा कहना है — ईमानदारी, सत्कर्म।
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