प्रश्नोत्तर P3-0181 · भाग 3
(कुटिया में साधक) आप तो भगवान के पद को प्राप्त हुए; आपने वीडियो में बताया कि उस स्थिति में आने के लिए आपने कितनी मेहनत की। बाकी सबने वेदों के पठन आदि से ज्ञान लिया, पर आपके यहां तो खाली प्रत्यक्ष ज्ञान का मूल — ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग — है। क्या इतने से हो जाएगा, और जीवन में गुरु की कितनी जरूरत है?
ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग — सत्संग हमारे जीवन में भी मिला है। हमने घटनाएं बताई हैं ना — तीन जगह। तो हमें भी सत्संग मिला है, लेकिन कुछ ही समय मिला है, क्योंकि हमें उतने की ही जरूरत थी। पहला मिला था बद्रीनाथ में — बताया था मैंने घटना; उन्होंने आखिरी में कहा, तुम बहुत अच्छे संत हो, और मैं नीचे मिलूंगा। फिर कुछ सत्संग उनसे मिला। फिर इसके बाद चित्रकूट में मिला — उन्होंने कहा कि जल्दबाजी मत करो। तो फिर आखिरी में नर्मदा तट पर मिला कि तुम्हें कोई भारत में भी आत्मज्ञान नहीं करा पाएगा। ये सत्संग हमें कुछ ही क्षण का मिला। हमें भी सत्संग मिला, क्योंकि सत्संग नहीं मिलेगा तो छुड़ा ही नहीं पाओगे अपने आप को।
छुड़ाओगे कैसे? आपको तो बांधना आता है ना। जैसे एक बालक का जन्म होता है, तो उसको क्या आता है? खाना। मल साफ करना थोड़ी ना आता है। तो जीव को फंसाना आता है, निकालना नहीं आता; निकालना वो भूल गया है। जैसे बच्चे को मां मल को साफ करना सिखाती है — पहले वह खुद करती है, और वो धीरे-धीरे सीख लेता है; फिर देखो, अब भी आप मल करते हो, एकदम साफ-सुथरे हो — वैसे ही गुरु इस जगत में कैसे जियो कि आपको विकार छू भी ना पाए, वो सिखाता है, और पिछले विकार को कैसे धोना है, वो सिखाता है। हर जीव खा लेता है, लेकिन मल साफ करना बच्चे को नहीं आता; खाना आता है, उठा के खा लेगा, लेकिन धोना नहीं सीखा। तो हम जीव अपने आप को फंसाना सीख गए हैं, लेकिन निकालना हमें नहीं आता। अब निकालने के लिए कोई गुरु चाहिए। ईमानदारी, सत्कर्म और गुरु का सत्संग — ये तीनों चाहिए जीवन में, तभी आप निकल (पाओगे)। समझ गए तो इसका अनुसरण करो।
कल्पनाओं में मत जाओ। जब हमारे जीवन में प्रत्यक्ष आ जाए, बात करे, तब ठीक है। मैं कह रहा हूं — हो तो पीछे से बात क्या कर रहा है, आगे आ जा, पर्दा ही उठा। कल्पना में मत जाओ। जिस दिन आपकी मुलाकात प्रत्यक्ष हो, तब (उसका) कोई मतलब है। परमात्मा सृष्टि को चला रहा है — यह सब कल्पना है। परमात्मा इस सृष्टि को चलाता तो इतनी गंदी दुनिया हो जाती? कल्पनाओं में लोग भगवान बन के बैठे हैं।
हम पहले सेवा करते थे, लोगों को दवा देते थे, तो लोग कहते थे — कैसे खाना है बाबा जी? तो बोले — श्रद्धा से, विश्वास से? मैंने बोला — हर दवा पे मुझे एक गाली देना। दवा (काम) करेगी; श्रद्धा-विश्वास की बात क्या है इसमें? एक माताजी आईं, तो मुझे प्रणाम करने की भीड़ खूब लगी थी; बोलीं — माताजी। मैंने बोला — ना भैया, कहो तो मैं कपड़े निकाल दूं, मैं लड़का हूं। ये दुनिया भगवान बना देती है। भगवान कभी मत बनना। लोगों के लिए कभी भगवान मत बनना; बनना तो अपने लिए। भगवान कौन? जिसने जन्म-मरण से, इच्छा-अपेक्षा, राग-द्वेष, मोह-आसक्ति, मेरा के भाव से अपने आप को छुड़ा लिया — वो भगवान है। तो भगवान बनना तो अपने लिए बनना है; गलती मत कर देना। ये दुनिया वाले तुरंत बना देंगे — बैठा के माला पहना दो बाबा को, लोग विभूति देने लगे। भगवान बनना बड़ा आसान है, समाज आपको बना देगा। भगवान कभी लोगों के लिए मत बनना, ये गलती मत करना।
लोगों के लिए कुछ ना बनना। लोगों के लिए ही तुम बन के भटक गए हो। आज अगर आप फंसे हो, तो अपने चक्कर में नहीं फंसे हो — अपने चक्कर में फंस ही नहीं सकते, संभावना ही नहीं है। तुम हमेशा दूसरों के चक्कर में फंसे हो। तुम जब भी फंसे हो, तुलना में फंसे हो। जब तुम्हारे जीवन में तुलना की एंट्री हुई, तुलना को आपने स्वीकार किया, तब आप फंसने लगे। तुलना मतलब कोई और है तुम्हारे अलावा। जब उससे आपने अपनी तुलना की और अपने आप को कम पाया, उसे ज्यादा पाया, तब आप उससे ज्यादा होने के लिए बेईमानियां करने लगे कि मैं इससे ज्यादा हो जाऊं। तो मेरा यही कहना है कि कभी लोगों के लिए कुछ बनने का प्रयास मत करना, यह गलती ना करना।
मैं जब से निकला, मुझे तो 2010 से ही गुरु बना रहे थे, पहले से ही आश्रम दे रहे थे। 2011 से ही हम कहे — ना बाबा, अपने को ये सब नहीं बनना है। मठाधीश, महंत — हम तो कब का बन जाते। 2011 में ही हम कहे — ना ना, ये गलती नहीं करूंगा। मुझे जब तक आत्म का बोध नहीं होगा, आत्म का ज्ञान नहीं होगा, तब तक मैं अपने लिए इस पृथ्वी पर एक कुटिया भी नहीं बनाऊंगा; पक्का, मेरी जिंदगी ऐसे खुले आसमान में रहेगी। मैं अब निकल गया तो निकल गया — जिसके लिए मैं निकला हूं (वो होने तक)। मैंने देखा ना कि समाज में गुरु बनना, भगवान बनना बहुत आसान है — इस समय तो खूब आसान है। अपने आप को निकालना सबसे कठिन है।
तो मेरे तो जीवन में ईमानदारी, सत्कर्म और फिर सत्संग। अगर ईमानदारी नहीं है तो फिर सत्संग का भी मतलब नहीं; तुम वहां रुक ही नहीं सकते। अगर गुरु मिल भी जाए, तो तुम टिकोगे थोड़ी ना। ईमानदारी-सत्कर्म जब आप अपनाने का प्रयास करोगे, भाव रखोगे कि नहीं, मैं ईमानदारी अपनाना चाहता हूं, मुझे बेईमानी से घिन आ गई है, और मैं समाज सेवा करना चाहता हूं, मैं लोगों की मदद करना चाहता हूं — तब गुरु का तुम्हारे जीवन में आगमन होगा, और वह फिर तुम्हें धीरे-धीरे निकालने के लिए मार्ग (दिखाएगा); तभी आप इस भवसागर से निकल सकते हो। तुम्हें सिर्फ अभी बांधना आता है, निकालना थोड़ी ना आता है। जैसे कोई पैदा हुआ, उसे कुछ नहीं पता है, खाना सीख गया है — यहां तक कि वो जानवर भी उठा के खा रहा है — उसे खाना आता है, अपने मल को धोना नहीं आता। वैसे ही जीव को (निकालना नहीं आता); इसलिए जीवन में जीवंत गुरु चाहिए, जैसे जीवन में जीवंत मां चाहिए। अगर किसी बच्चे का जन्म हो जाए और मां ना हो, कोई मां का रोल ना करे, तो बच्चे की क्या हालत होगी? अपना कुछ ना कुछ ढूंढ के खाता रहेगा, पूरा मैला अपने शरीर पर लपेटे घूमेगा; उसे मैले का पता भी नहीं है, दूसरे को घिन आएगी। इसलिए आपको आपकी बेईमानी से घिन नहीं आ रही है, दूसरों को आ रही है। हर आदमी दूसरों को ईमानदार चाहता है, खुद बेईमानी कर रहा है। तब गुरु आता है; इसीलिए गुरु को दर्पण कहा गया है। तब वो दिखाता है कि यार, तू कितना गंदा हो गया — तू देख कितना गंदा हो गया। पहले वह गंदगी बताता है; फिर (जब) वह कहता है कि मैं अब इससे साफ कैसे हो जाऊं, तो वह साफ होने का मार्ग बताता है।
इसीलिए इतिहास में कहा गया कि भाई, जीवंत गुरु बहुत जरूरी है। बहुत अच्छी मां थी, लेकिन फोटो में आ गई, तो वो थोड़ी ना बच्चे के लिए मायने रखती है; जीवंत मां चाहिए। देश-काल-स्थिति-परिस्थिति में हर तरीके से, अलग-अलग तरीके से लोग फंसते हैं, इसलिए जीवंत गुरु चाहिए, अभी का गुरु चाहिए, क्योंकि अभी की बेईमानी करने का तरीका अलग हो गया; 100 साल पहले अलग था। पहले लोग रिश्वत लेते थे, पकड़े जाते थे तो मुंह छुपा के चलते थे; अब तो सीधा कहते हैं — ऊपर से कितना कमाते हो। बदल दिया तरीका।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01