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प्रश्नोत्तर P3-0186 · भाग 3

(वही साधिका) तो आपका कहना है कि मेरी इच्छाएं बाहर की जानकारी से बनी हैं? पर कोई बंदा जंगल में पला-बढ़ा हो, उसके हार्मोन हों, उसे कोई जानकारी नहीं दे रहा — पशुओं को भी कोई जानकारी नहीं देता — तो क्या बिना जानकारी के वह फंसेगा ही नहीं, इच्छा पैदा ही नहीं होगी? और हम आज के युवाओं को ज्यादा से ज्यादा जानकारी के लिए प्रेरित करते हैं — तो हमें कितनी जानकारी लेनी-देनी चाहिए?

नहीं होगी (इच्छा), और वो फंस नहीं पाएगा। अगर वो करेगा भी, तो फंस नहीं पाएगा, क्योंकि वो शरीर के लिए करेगा और हट जाएगा; फंसेगा नहीं। जैसे आज तक हमने मानव के अलावा किसी भी जीव को नहीं कहा कि फंसे। समझना इस बात को — मानव के अलावा किसी को कहा गया कि रेप किया? वो स्वाभाविक करते हैं; उनको कभी बेईमान नहीं कहा गया। फंसेगा कैसे? जैसे वो पैदा हुआ, तो खाना पता है? शरीर की जैसे भूख लगती है, वह खा लेता है; वह भूख को महसूस कर पा रहा है। तो जैसे हार्मोन भी होंगे, तो वो हार्मोन जहां निकलना होगा निकल जाएगा, लेकिन बेईमानी नहीं करेगा, फंसेगा कभी नहीं। इच्छा समझिए ना — पहले इच्छा को समझिए। जरूरत को इच्छा नहीं बोला जाता। मान की इच्छा, बड़ा बनने की इच्छा, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा — ये इच्छा है। बस ये दो-तीन इच्छाएं, इसी में तो सब आ गया। (जरूरत पूरी हो गई, उसके बाद जो कर रहे हो) वो इच्छा है, और वो गिराती है। हां, जानकारियां ही इच्छा को जन्म देती हैं। अगर आप बड़ा बनना चाहते हो, तो बड़े-छोटे की आपको जानकारी दी गई है; अगर बड़े-छोटे की जानकारी नहीं दी जाती, तो आप बड़ा (नहीं बनना चाहते)। इसीलिए देखो, जिस क्षेत्र में कोई रहता है, जैसी भाषा उसे सिखाई जाती है, उसी भाषा का ज्ञान होता है। (सत्संग सुनकर अध्यात्म की इच्छा जागृत हुई —) हां, नहीं तो नहीं होती। अब आपको समझ में आ गया कि मैं जहां हूं, वहां ठीक नहीं है — चाहे वो मान की इच्छा हो, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा हो। बात समझ में आ गई, अब आप उससे छुटकारा पाना चाहते हो। (कितनी जानकारी —) जितने में मैं जी सकूं, जितने में मैं इस शरीर में रह सकूं, उतनी जानकारी। जैसे बड़ा बनने की जानकारी मां-बाप को बच्चों को नहीं देनी चाहिए कि तुम्हें बड़ा बनना है। बड़े-छोटे की जानकारी नहीं देनी चाहिए — आवरण से कि यह बड़ा है, यह छोटा है — यह नहीं देना चाहिए। तुलना नहीं करनी चाहिए, तुलना की जानकारी नहीं देनी चाहिए, क्योंकि बड़े-छोटे में मान आता है; और मान — बड़ा-छोटा बनना — एक तरह से गलत जानकारी है। ये गलत जानकारी हमारे अंदर घुसा दी जाती है, और इस जानकारी की वजह से हम अपने जीवन को बर्बाद कर देते हैं। समाज की कुछ ऐसी जानकारियां हैं कि हमें ग्रसित करके रखी हैं। जैसे जातिवाद की जानकारियां समाज में दी गईं कि यह जात से छोटा है, तुम बड़े हो; वो तुमसे बड़ा है, बुजुर्ग है, लेकिन तुम अगर इस घर में पैदा हुए तो वो नीचे बैठेगा, तुम ऊपर बैठोगे। तो ऐसी जानकारियां हमें कितना गिरा देती हैं; और ये जानकारी हमारे अंदर एकदम कूट-कूट के भरी जाती है, और इससे हमारा जीवन ग्रसित है। इच्छा क्या है? जरूरत से ज्यादा पाना इच्छा है। आप एक बात बताइए — आपने कभी किसी पशु को कहा कि इसकी कोई इच्छा है? (उसे) जानकारी नहीं होगी, तो फिर आप वहां जाओगे कैसे? अपने ऊपर काम करो। जानकारी ही इच्छा को जन्म देती है; लेकिन इच्छा को समझ लेना कि इच्छा क्या है। यही तो जानकारी हमें परेशान करके रखी है, इसी में तो हम ग्रसित हैं; और यह जानकारी हमारे अंदर कूट-कूट के भरी गई है, हमारे लोगों ने ही भरी है, और इसी के चक्कर में तो बेईमानी हुई हमसे। आप इस पे बैठकर चिंतन करो।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01