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प्रश्नोत्तर P3-0188 · भाग 3

(वही साधिका) जातिवाद जैसी जानकारियां समाज के लेवल पर ठीक है, लेकिन मैं इंटरनल जर्नी — अंदरूनी, मानसिक यात्रा — की बात कर रही हूं। मेरी अंदरूनी कामनाएं ही तो बाहरी रूप लेती हैं। जैसे मेरी जीभ का आकर्षण या देखने का आकर्षण — उसकी किसी ने जानकारी नहीं दी, वो अंदरूनी है। एक ही घर में पले बच्चों में भी किसी को घर का स्वाद, घर के लोग पसंद नहीं आते, पड़ोस की चीजें आकर्षित करती हैं — तो वह आकर्षण तो मेरे भीतर ही हुआ ना? क्या बाहर वाली जानकारियां ही मेरी इच्छा पैदा करती हैं?

बाहर में ही तो हम फंसे हैं। अगर देखा जाए तो हम अंदरूनी थोड़ी फंसे हैं — कहां अंदरूनी फंसे? बाहर में ही दुखते हैं। पहले तो (आप कहते हो) अंदरूनी कामना है — कामनाएं आईं कहां से? मान की कामना आपके अंदर कहां से आई, ये बताइए। बड़ा बनने की कामना कहां से आई? क्या आपके द्वारा आई? कामना का जन्म और बड़ा बनने का जन्म क्या आपसे हुआ? क्या इसके जन्मदाता आप हो? (स्वाद का चक्कर —) अंदरूनी तब हुआ जब आपको बाहर से स्वाद मिले; वैसा-वैसा भोजन अलग-अलग तरीके का दिया गया। स्वाद अपना-अपना है, लेकिन आपको अलग-अलग तरीके से मिला, तब आप स्वाद में फंसे ना। तुरंत आप स्वाद में थोड़ी फंस गए; फंसे कब? पहले तो आपको जरूरत में भोजन दिया गया। अब स्वाद आपको अलग-अलग तरीके से आपके मां-बाप ने, समाज के लोगों ने खिलाना चालू किया, तो आपने किसी स्वाद को पकड़ लिया। लेकिन स्वाद ही नहीं खिलाया होता, तो आप पकड़ पाते क्या? अगर स्वाद बना के भोजन बनाना कोई सिखाता ही नहीं, तो आप स्वाद थोड़ी पकड़ पाते। अगर (बच्चे ने बाहर) आंखों से देखा, तो किसी ने उसे बनाया ना; अगर कोई बनाता नहीं, तो आंखों से देखता कैसे? मैं यही कह रहा हूं कि आपके पास जितना भी है — अगर आप परेशान हो, तो सिर्फ बाहर की चीजों से ही परेशान हो। यही तो कहा जाता है कि आप अपने आप में हो जाओ, परम आनंद में हो जाओगे। आपके अंदर इच्छा वो पैदा नहीं होती है; आपके लिए तो सिर्फ एक भूख है — चाहे जैसे मिट जाए। जब आपके सामने कई ऑप्शन आ जाते हैं, और कई ऑप्शन को जब टेस्ट करने लगते हो, तब आप चुनाव करते हो — ये ठीक है, ये ठीक नहीं है। लेकिन कई ऑप्शन आए तब ना; अगर कई ऑप्शन ना आते, एक ही आता, तब आप फंसते ही नहीं। (एक ही घर में पला बच्चा —) ऐसा हो ही नहीं सकता; जंगल में थोड़ी बोल रहे हो। आसपास-पड़ोस के लोगों को देख के सीखता है। मैं वही कहना चाहता हूं कि हमारे साथ समाज भी है; हम अपने घर का आचरण नहीं अपनाते, लेकिन बगल वाले का देख के अपना लेते हैं। ऑप्शन तो वो अवेलेबल ही था; ऑप्शन ही ना मिलता तो (आकर्षण कैसे होता)? आपके अंदर जितना भी भरा है, बाहर से ही भरा है — इसी बात को समझो। आपके अंदर, आप में, परम आनंद के अलावा कुछ नहीं है। एकदम — बाहर वाली ही जानकारियां हमारी इच्छा पैदा करती हैं। और इच्छा क्या है, वो भी आप समझ गए। अब इस पे काम करो; बस इस पे चिंतन करो।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01