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प्रश्नोत्तर P4-0040 · भाग 4

(लाइव) योगी जी प्रणाम। भक्ति श्रेष्ठ है या आत्मज्ञान?

नहीं, यहां श्रेष्ठ की बात नहीं है। क्योंकि जहां आप हो — चाहे वो भक्ति हो, चाहे ज्ञान हो — वही माध्यम बनता है आत्मज्ञान तक पहुंचने के लिए। कहा जाता है लक्ष्य श्रेष्ठ है; लेकिन अगर मार्ग ही नहीं है, तो लक्ष्य तक कहां पहुंचोगे? आप उसे नीचे भी नहीं कह सकते, क्योंकि वही तो निमित्त बना लक्ष्य तक पहुंचने के लिए। लक्ष्य सर्वश्रेष्ठ है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मार्ग नीचे है; क्योंकि मार्ग ही नहीं होता तो लक्ष्य तक कहां पहुंचते? तो मार्ग को भी प्रणाम, मार्ग बताने वाले को भी प्रणाम। अगर मार्ग भी है, और कोई बताने वाला नहीं है, तो भी आप कुछ नहीं कर सकते — आप चौराहे पर खड़े हो, अगर कोई रास्ता बताए ही ना। आपने दुनिया में अपने आप को ऐसी जगह खड़ा कर लिया है कि रास्ते ही रास्ते दिख रहे हैं, और हर रास्ता कहीं ना कहीं ले जाएगा; लेकिन तुम्हें समझ में नहीं आ रहा कि मेरा रास्ता कौन है। अब आपका रास्ता आपको बताने वाला श्रेष्ठ है, लेकिन रास्ता भी श्रेष्ठ है। फिर लक्ष्य पे पहुंच गए, तो सबको प्रणाम है, और लक्ष्य सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि लक्ष्य के लिए रास्ता है। अगर लक्ष्य ही नहीं है, तो फिर रास्ते का भी क्या मतलब आपके जीवन में? रास्ता भी तभी श्रेष्ठ है जब लक्ष्य है; नहीं तो रास्ता भी तो भटका रहा है। आप ये सबके चक्कर में ना जाके जीवन में यात्रा करिए।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01