प्रश्नोत्तर P4-0145 · भाग 4
(लाइव) गुरु जी नमन। अपनों की कुटिया में कोई सेवा नहीं है, तो सुबह साधक को अपनी शुरुआत कैसे करनी चाहिए? और वहां सत्कर्म क्या होगा?
बस उठा, शौचालय गया, नहा-धो, और जा के बैठ। फिर काढ़ा पियो, और फिर 12 बजे के बाद नाश्ता, और फिर शाम को मिलजुलकर भोजन बना, खा के सो जाओ। यही है।
(सत्कर्म —) अगर कुछ मिल जाए तो कर दो — (जैसे) पेड़ लगे हैं, जाके उनकी निराई करो, लेकिन ये आप खुद करो ना, आप खुद जाके करो। और हम बोलेंगे तो जिसे उचित समझेंगे, उसे बोलेंगे। आप जिसके लिए आए, वह करो; और अगर आपको लग रहा है कि हां, मेरी जरूरत है, तो आप जाके करो — ये सत्कर्म है, और यहां है ही है। (कोई 4 बजे उठ के करता है तो) आप 3 बजे उठो — जिसको करना होगा, (करेगा)। अब आपने 3 बजे चालू कर दिया तो वो आके छीन थोड़ी ना सकता है; और वो चालू कर चुका, तो आप हाथ से थोड़ी ना ले सकते हो। और अगर उसने (काम आपको) दे दिया, तो इसका मतलब वो बस फॉर्मेलिटी कर रहा था, कर नहीं रहा था। जैसे मैं शुरुआत में — लोग (झाड़ू-)पानी ना मारें, तो मैं उठ के पानी मारने लगूं, तो लोग आए, बोले — अरे, आप मार रहे थे? तो (मैं बोला) जब 8–9 बज गए, कोई मारता ही नहीं, तो हम मारेंगे। फिर बोले — नहीं, दे दो। (मैं बोला) अब नहीं देना है, अब मैं ही मारूंगा।
तो कहने का मतलब, सत्कर्म तो बहुत है यहां। आप दुनिया में कहीं भी रहो, आपको सत्कर्म मिलेगा। आप रोड पे जा रहे हो, कोई गिर जाए — तो उस समय प्रशासन, कानून आएगा उठाने? उस समय वहां मौजूद व्यक्ति ही उठाएगा, उसका परिवार भी नहीं है। सत्कर्म कोई छीन ही नहीं सकता; सत्कर्म आप दुनिया के किसी कोने में कर सकते हो। अब अगर बाहर हो तो कम मिलेगा; अगर किसी आश्रम में हो, जीवंत गुरु की शरण में हो, वहां बहुत मिलता है। अगर उस दरवाजे पर कोई आ गया — आप तो उसे जानते नहीं — आपने उसे पानी पिलाया। यहां तो सत्कर्म ही सत्कर्म है दिन-रात — हां, आपको देखना आना चाहिए। अब पौधे में पानी देना सत्कर्म — ये पौधे का उपयोग पता नहीं कौन करेगा। बड़ का, बरगद का, पीपल का पेड़ — हजारों साल चलने वाले पौधे हैं। कितने लोग तपोभूमि पर आकर तपस्या करेंगे, कितने जीव-आत्माओं का कल्याण होगा, यहां बैठ के आश्रय लेंगे, कितने लाखों जीव बड़ के पेड़ पे भोजन करेंगे। अब जिन लोगों ने इसमें सहयोग दिया है — धन से, तन से, और अपनी समझ से — उनको जब तक ये वृक्ष रहेगा, तब तक आशीर्वाद मिलेगा। भाई, जब तक बैंक में मूल पैसा रहता है, तब तक ब्याज मिलता रहता है ना, लेकिन जब मूल खत्म तो आना खत्म; तो जब तक पेड़ रहेगा, तभी तक मिलेगा। यहां 200 के ऊपर सारे पेड़ हैं। (साधक ने कहा बाउंड्री के बाहर भी कुछ पेड़ लगे हैं, उनमें पानी दे दूं —) वही तो कह रहा हूं — दे सकते हो ना। बाहर क्यों नहीं? कहने का मतलब यही है कि सत्कर्म का मौका खूब है, अगर आप करना चाहो। अब नहीं करना चाह रहे हो, तो फिर कोई मतलब ही नहीं है। जीवंत गुरु की शरण में तो सत्कर्म ही सत्कर्म है, खूब है, क्योंकि वो तो 24 घंटे काम ही करता है — शारीरिक, मानसिक — क्योंकि वो पूरे विश्व के लिए काम कर रहा है, कोई समूह के लिए थोड़ी ना। इसीलिए तो कहा गया कि जीवंत गुरु की शरण में रहो, तर जाओगे — क्योंकि रहोगे तो करोगे; ऐसे तो रखेगा ही नहीं वो। तो उसकी शरण में रहने से ही व्यक्ति तर जाता है, (अलग से) करना कुछ नहीं पड़ता।
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वीडियो: 25 जनवरी 2026 रविवार प्रश्नोत्तरी#योगी · 2026-01-25