प्रश्नोत्तर P4-0158 · भाग 4
(वही साधिका) अब हमें पता कैसे चलेगा कि हम शिष्य हैं कि नहीं?
शिष्य तब है जब आपको अपने आत्मिक कल्याण के अलावा कुछ भी नहीं चाहिए; और अगर आपको कुछ और चाहिए, तो आप शिष्य नहीं। जैसे अब ये (बालक) — मैं आत्मिक कल्याण करके (लौटूंगा) — जहां आत्मिक कल्याण होगा, वो बताएगा ना कहां जाना है? ये तो तय करके आए हैं कि आत्मिक कल्याण करके (वापस जाना है)। तो इतनी अच्छी जगह थी, छोड़ा क्यों? जहां से आत्मिक कल्याण होगा, आत्म कल्याण के बाद पता चलेगा ना कि आगे कहां जाना है। तुमने तो अभी तय कर लिया। अब ये कल्याण कैसे होगा? क्योंकि ये बांध के ही तो आए हैं अपने आप को कि मैं आत्मिक कल्याण के बाद वहीं जाऊंगा — और ये कहीं ना कहीं आसक्ति भी (है, जो) दिखती नहीं। आत्मिक कल्याण के बाद तो तुम आगे जाओगे, लेकिन तुम कह के आए हो कि आत्मिक कल्याण के बाद आऊंगा, तो इसका मतलब तुमने उस जगह को छोड़ा ही नहीं है। आपको यह बोलना पड़ेगा — अब हम जा रहे हैं अपने आत्मिक कल्याण के लिए, और आत्मिक कल्याण के बाद क्या होगा, मुझे भी नहीं पता — तब जाके आत्मिक कल्याण होगा। आप तो पूरी प्लानिंग से आए हो कि हमारा आत्मिक कल्याण होते ही मैं आ रहा हूं — तो तुम आए ही कहां? आत्मिक कल्याण के बाद आगे जाओगे कि पीछे जाओगे? लेकिन आप पीछे जाने के लिए बोल के ही आए हो। शब्द ही तो बंधन है — आप क्या बोलते हो, आपका कमिटमेंट क्या है, क्या वादा करते हो, वहीं आपको जाना पड़ेगा। (साधिका ने माना कि सूक्ष्म रूप में वो विचार उसमें भी है —) आपने उस स्थान को छोड़ा कहां? आत्मिक कल्याण के बाद क्या होगा, हमें पता है? हम कैसे वादा कर दिए? (अब) रोज-रोज देखेंगे — भाई, हो रहा है कि नहीं, (हो जाए तो) मैं जाऊं। और जैसे-जैसे दिन बीतेगा, वैसे-वैसे एक व्याकुलता और बढ़ेगी कि यार, जल्दी हो, मैं जाऊंगा — क्योंकि आप बोल के आए हो, और वो भी इंतजार कर रहे हैं; कहीं ना कहीं उनको भी होल्ड कर रखा है। यही आसक्ति है, यही उम्मीद है। इसलिए शब्दों को बहुत सोच-समझ के, सूझबूझ के साथ बोलना चाहिए — कि यह शब्द बंधन है कि मुक्ति? हम किसी से बात कर रहे हैं, तो यह शब्द इस व्यक्ति को बंधन दे रहा है कि मुक्ति? ऐसा तो नहीं हम इसे कुछ वादा कर रहे हैं?
(बालक ने कहा — मैंने बोला है कि जब तक नहीं होगा, नहीं आऊंगा; होगा तो वहीं चला जाऊंगा —) फिर मैं वही हो जाऊंगा ना। मैं इस जगह को छोड़ के यहां आया, मुझे कुछ मिल गया, और इसी जगह पर (मैं) खो गया था; तो जब मैं यहां से वहां जाऊंगा, तो फिर मैं वही आ जाऊंगा ना। और अब पता चला कि जिनसे आप वादा करके आए हो, वो कहीं निपट लिए, तो फिर उनसे भी मिलना है, क्योंकि वो तो आपका इंतजार ही कर रहे थे — अब उनके लिए आपको जन्म लेना पड़ेगा। (बालक ने कहा मैंने बोला इंतजार मत करना —) नहीं, ये आपकी व्यक्तिगत बात नहीं हो रही है। यहां लाइव लोग सुन रहे हैं — हम कैसे फंस जाते हैं, मैं वो बता रहा हूं; अगर ऐसे फंसे, तो फिर कैसे मुक्त होंगे। भाई, जितने लोग मेरे हैं, आप उन्हें ये कह दीजिए — अगर आपकी जिम्मेदारी, दायित्व है, तब तो वहीं रह के कल्याण करो; और अगर आपने ऐसा कुछ (दायित्व) लिया नहीं है, तो आप ये कह दो कि अब हम जा रहे हैं अपने आत्मिक कल्याण के लिए, क्या होगा मुझे पता नहीं; ये मेरा आखिरी मिलना है मेरी तरफ से। बोलना पड़ेगा बेटा, बोलना ही पड़ेगा, नहीं तो वो तो इंतजार कर रहे हैं, कहीं ना कहीं मानसिक (बंधन है); फिर जाना पड़ेगा।
तो मैं आपको बता रहा हूं कि अपनी क्षमता के अनुसार आप प्रश्न करिए, अपनी क्षमता के अनुसार मार्ग पूछिए; और अगर आपको अपनी क्षमता नहीं पता है, तो सामने वाले को जांच कर, भैया, सौंप दो कि अब आप ही देखो — पूरी निष्ठा से, (कि) पूरी तरह मैंने आपको समझ लिया। आप उसके साथ एक दिन क्या, कई साल रहो; एक-दो दिन में फैसला मत ले लो। लेकिन जब छोड़ दो ना, तो छोड़ दो। द्रौपदी ने शुरू में भगवान को नहीं बुलाया — पहले सबका इंतजार किया, और आखिरी में बोल दिया कि अब तुम्हारी ही बारी है, तुम्हारा ही वादा था, अब तुम आखिरी हो। अगर शुरू में ही बुला लेती तो सबकी औकात पता नहीं चलती। तो मैं ये कहना चाहता हूं कि जिसको आप कहने वाले हो कि सब कुछ आपके हाथ में, तो ये तुरंत आवेश में, जज्बात में आके पहले दिन मत कह दो। उसके साथ एक महीना, एक साल, दो साल आराम से रहो, खूब समझ लो। लेकिन जिस दिन आप पूरी तरह छोड़ो, (उस दिन पूरी तरह छोड़ो)। और देखो, छोड़ने के बाद वो भी स्वीकार करता है कि नहीं। तुमने जांच कर उसे कहा कि अब आपके हाथ में — अब वो भी जांचेगा ना, अब उसकी परीक्षा चालू होगी। जब आप ये कह दोगे कि आपके हाथ में, आप जैसा कहोगे वैसा मैं करूंगा — तो अब वहां से तुम्हारी परीक्षा गई, उसकी (गुरु की) परीक्षा शुरू हो गई। अब पता नहीं वो कितने साल में आपको स्वीकार करेगा — ये भी पता नहीं। लेकिन जब वो स्वीकार करेगा, तो कल्याण उसी क्षण पक्का हो गया; अब तुम्हारी जिम्मेदारी खत्म हो गई, अब उसकी जिम्मेदारी हो गई, अब वो तुम्हारा कल्याण करके ही तुम्हें छोड़ेगा। लेकिन (गुरु के) स्वीकार करने के बाद — तुम्हारे सिर्फ स्वीकार करने से कुछ नहीं होगा।
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वीडियो: आखिर मेरा कल्याण कैसे हो ?#योगीजी_का_सत्संग · 2025-09-30