प्रश्नोत्तर P4-0170 · भाग 4
(वही साधिका) सचेत रहने के लिए भी समझ विकसित करनी पड़ेगी — समझ ऐसे बोलने से नहीं बढ़ती। आज पता चला कि मेरा शरीर-भाव इतना गहरा है; अब शरीर-भाव से बाहर आने के लिए कैसा चिंतन करें?
आपने अपने शरीर की सुरक्षा की जवाबदारी मुझसे लिवाई, तो ये भी तो समझ है — क्या बिना समझ के लिवाई? ये बेईमानी वाली समझ है। तो समझ नहीं है क्या? पूरी जिंदगी की जवाबदारी लिवा ली कि सेवा आपके द्वारा होगी — ये बिना समझ के हो गया क्या? (साधिका ने कहा, शरीर के लिए भाव इतना गहरा है, ये अटैचमेंट पता नहीं था —) लेकिन इसमें भी समझ चाहिए; बिना समझ के आप ये भी नहीं बोल पातीं कि अटैचमेंट कड़ा है हमारा। चलिए, पता तो चला। इसीलिए तो कहा गया है कि जीवंत गुरु की शरण में रहो।
(शरीर-भाव से बाहर आने के लिए कैसा चिंतन करें —) आज पता चला; चिंतन तो अब आगे है — होगा चिंतन, वो खुद चिंतन होगा। अगर आज आपका टेस्ट हुआ है, तो आप उस टेस्ट के योग्य हुए, तब टेस्ट हुआ। तो (अपने आप में) पड़े रहने का मतलब है — अपनी तैयारी करते रहो।
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वीडियो: आखिर मेरा कल्याण कैसे हो ?#योगीजी_का_सत्संग · 2025-09-30