प्रश्नोत्तर P4-0180 · भाग 4
(कुटिया में) जो साधक कोई भाव बनाकर आता है — जैसे 'मैं शिशु बनकर आया हूं' — उसकी जांच यहां कैसे होती है?
जैसे बालक आया था — क्या भाव बना के आया था? कि मैं शिशु बन के आया हूं। तो पहली मुलाकात में इसे डांटा गया कि सच में तू शिशु है कि नहीं। इसीलिए मैंने कहा — बेटा, उस पॉइंट को देख, तेरी स्थिति क्या हुई; क्योंकि तू शिशु बन के आया था, और शिशु में कुछ होता ही नहीं है, तो डांटने पे तेरा भाव क्या था? इसीलिए मैं उस दिन इसे कह रहा था कि जब तूने ऐसे (हाथ उठाकर) किया, तो वो स्थिति देख — इसकी जांच तुरंत हो गई कि यह शिशु बना (या नहीं)। शिशु बन के आया होता, तो हाथ ऐसे नहीं होते। बात समझ रहे हो बालक? हमारे शरीर के हाथ ऐसे तभी होते हैं, जब हम सामने वाले को बता रहे हैं। अब ज्यादा जोर मत दो — ये हाथ ऐसे ही नहीं उठते हैं, शरीर (में) ऐसे ही उंगली नहीं उठ जाती है। मैं तो तुम्हें तुम्हारी स्थिति दिखाना (चाहता था) कि आप शिशु हो या नहीं; लेकिन उस समय आप शिक्षक ही थे, तभी आपका पोजीशन ऐसे हुआ। अगर अपने आप में होते, तो ऐसे भी नहीं होता। जब हम ऐसे करते हैं, तो ये होता है कि आप चुप रहो, बहुत ज्यादा हो गया — ये संकेत है। यहां तो जिस दिन से तुम आए, उसी दिन से (काम) चालू हो जाता है।
यहां एक व्यक्ति ने एक बार कमेंट किया था — कुटिया बनाने के पहले, जब मैंने पता दिया था और बनाना शुरू किया था — तो बोला, मैं आऊंगा तो क्या कपड़े भी लेके आऊंगा? तो मैं बोला — नंगे आना, कपड़े मैं दूंगा, तुम नंगे चले आना। वो व्यक्ति यहां आया था। जैसे ही आया, कुछ देर बाद मैंने कहा — जाओ, स्नान वगैरह करके आ जाओ। तो बोला — मेरा पता नहीं पूछोगे? मैं पता कर के क्या करूंगा तुम्हारा? तो उसने कहा कि मैं यह भाव बना के आया था कि अपनों की कुटिया में जा रहा हूं, जब मुझसे पता पूछेंगे, तो मैं पूछूंगा कि जब अपनों की कुटिया है तो पता (क्यों)? तो यहां पे आप अगर आए ना, तो यहां पे काम होना शुरू हो गया। और उसे भागना भी पड़ा। मैंने रात को बोला — चुप बैठो, नहीं तो मैं अभी भगा दूंगा, रात को भी भगाना मुझे आता है — इसलिए कि वो कह रहा था, मुझे अलग से व्यवस्था करो, मैं पैसे दूंगा। यहां पैसे और पद दोनों नहीं चलते। ये सृष्टि अलग है — तुम समझ नहीं पा रहे हो — यहां तुम्हारा पद, बैकग्राउंड और पैसे चलते ही नहीं। इस सृष्टि में — मैंने एक सृष्टि बनाई है — और जब तक ये शरीर रहा और मैं रहा, यहां जैसे सबके लिए व्यवस्था है, आप उसी (में रहोगे)। फिर वो दूसरे दिन चला गया। (पहले) नाश्ता-भोजन सब मैं ही देता था — ऐसा नहीं कि 12 के बाद मिल जाता था; मैं कभी 1 बजे देता था, कभी 2 बजे; और उनको खिलाने के बाद ही खाता था। तो (वो) बोलते थे जल्दी करो — मतलब जितना बोलोगे, उतना लेट होगा; जितना बोलोगे मुझे नाश्ता दो, उतना लेट होगा, क्योंकि मैं दूंगा तो अपनी मर्जी से।
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वीडियो: आखिर मेरा कल्याण कैसे हो ?#योगीजी_का_सत्संग · 2025-09-30