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प्रश्नोत्तर P4-0196 · भाग 4

(वही साधिका) सूरज एक है, मैं उसका ताप अपनी क्षमता के अनुसार सहन कर पा रही हूं। जो मुझे दुख-तकलीफ दे, मुझे उससे पार होना है। पर दुख की तो कोई चाह नहीं करता, आदमी हमेशा सुख की कामना करता है — फिर दुख क्यों आता है?

वही सूरज का ताप फूल पे गिर रहा है, (तो) सुगंध फेंक रहा है; लैट्रिन पे गिर रहा है, (तो) बास मार रहा है, बदबू आने लगी — ताप तो एक है। आपने उस दुख के लिए काम किया है, ऐसे नहीं दुख पाया है — आप ये मत समझिए। कोई भी चीज अपने से नहीं आती; आपने उसके लिए काम किया है। (दुख की कोई चाह नहीं करता —) मैं एक व्यक्ति हूं, मैं कह सकता हूं कि मैंने दुख को चुना है जीवन में, शौक से। मैं अपने आप को उस जगह पे ले गया, जहां दुख ही था। जैसे मान लीजिए, मेरे पास व्यवस्था थी, फिर भी मैं ठंडियों में नदी किनारे बिना बिस्तर के पड़ा रहा। (साधिका ने कहा, आप खुद को जानना चाहते थे —) आपको सुख भी तो मिला ना, आनंद भी तो मिला ना — बहुत लंबे अरसे के बाद रिजल्ट आते हैं। (आप कहते हो कोई कुछ करता नहीं, फिर आपने कैसे दुख चुना?) वो आखिर में पता चल जाएगा। मैंने (वो) आखिरी स्टेटमेंट दिया है — ये अभी करने वालों के लिए नहीं है, ये आखिरी वालों के लिए है। कुछ देर पहले बोला — 'आप समझ पाओ तो' — आपने वो नहीं समझा, मैं आपको हिंट भी दे रहा था। वो शब्द इतना साधारण नहीं है समझना, इसलिए मैं कह रहा था 'समझ पाओ तो'। (वो) तब समझ पाओगी, जब आप समझने से मुक्त हो जाओगी।

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वीडियो: अगर भक्त न हो तो भगवान का क्या होगा ? क्या भगवान भक्त पर निर्भर हैं ? #bhakt #bhagvan · 2025-07-17