प्रश्नोत्तर P5-0186 · भाग 5
ईमानदार हो गए तो कम कमाने क्यों लग जाते हैं? स्किल तो अंदर ही है — ईमानदारी के साथ ज्यादा कमाकर सत्कर्म क्यों न करें?
ऐसा नहीं है। इसे बहुत गहराई से समझिए। बेईमानी की जब हम शुरुआत करते हैं, तो ऐसा नहीं कि हमने एक ही दिन में कमाना चालू किया। बेईमानी में व्यक्ति क्या करता है? चौबीस घंटे मेहनत करता है। अब जैसे ही ईमानदारी अपनाई, उसने मेहनत कम कर दी। जैसे इस व्यक्ति ने कहा कि जब मैं बेईमानी करता था तो मैं बच्चों को समय नहीं देता था, रात को खाता था। इसका मतलब ये हर वक्त लगा था। समय कहां दे रहा था? हर वक्त बेईमानी के व्यापार में। यानी काम तो कर ही रहा था, चौबीस घंटे। ऊर्जा भी दे रहा था, ताकत भी। अब कोई व्यक्ति चौबीस घंटे काम कर रहा है, और जैसे ही ईमानदारी अपनाई उसने आठ घंटे काम चालू किया, तो इनकम तो कम हो जाएगी।
मेरा कहना ये है कि मैं अब अपने बच्चों में जाऊं। जरूरत क्या है? पहले ये समझो। जरूरत यह है कि मैं इतना सामर्थ्यवान बन जाऊं, धन से, तन से और समझ से, कि मेरे सामने कोई भी आए, मैं उसकी जरूरत पूरा कर दूं। मैं उस लायक बन जाऊं। जैसे आज यहां आपके घर में लिमिटेड लोग हैं, लिमिटेड ही आ सकते हैं। लेकिन यहां अनलिमिटेड आ सकते हैं। तो एक व्यक्ति ने अपने आप को उस जगह लाके खड़ा कर दिया कि कितने लोग भी आ जाएं, मैं उसे रहने की व्यवस्था से लेकर खाने-पीने का सहारा, ओढ़ना-बिस्तर, सब दूंगा। वो आपके जैसा ही था। लेकिन उसने दिन-रात मेहनत की, ईमानदारी से, और अपने आप को वहां लाके खड़ा कर दिया, अनलिमिटेड। तो आप मेहनत करिए। जरूरत क्या है? जरूरत इतना है कि मैं क्या कर दूं कि मेरा कल्याण हो जाए। मैं अपना कल्याण कैसे कर दूं।
मेरा कल्याण मेरी जरूरत है। मेरी जरूरत ये वैभव का नापतोल नहीं है। मेरा कल्याण मेरी जरूरत है। तो मेरे द्वारा क्या हो जाए कि मेरा आत्मिक कल्याण हो जाए। अब मेरे आत्मिक कल्याण के लिए मुझे सत्कर्म करना है। सत्कर्म के लिए तीन चाहिए। एक चाहिए धन, एक चाहिए तन, और एक चाहिए मेरी समझ। अब तीनों को ज्यादा से ज्यादा खर्च करो। ज्यादा से ज्यादा खर्च करोगे तो ज्यादा से ज्यादा लाना भी पड़ेगा। तो ज्यादा से ज्यादा मेहनत करो, कि तीनों मेरा कैसे बढ़े, और तीनों समाज के सदुपयोग के लिए खर्च करो, जरूरतमंद के लिए। सिकुड़ो मत। अगर बेईमानी में आप चौबीस घंटे लगे थे, तो ईमानदारी में भी चौबीस घंटे लगो। आप सिर्फ अपनी बीवी-बच्चों तक मत सिकुड़ जाओ। वो तो जानवर भी करते हैं, कि मैं अपने बच्चों के साथ समय देने लगा। समाज में और बच्चे आपको नहीं दिखे? मैं अपने परिवार को समय दूं, इससे क्या हो जाएगा? मुझे सुकून मिले, शांति मिले। इससे क्या हो जाएगा? इससे नहीं होगा। मुझे मेहनत और बढ़ा देनी चाहिए।
अब यहां रहने वाले मुझे देखते हैं। जैसे बाबूलाल कल देख रहे थे। दो बजे के बाद सोने गए। आप लोगों की एक नींद पूरी हो जाती है। बाबूलाल की एक नींद पूरी हो गई। दोबारा उठे तो मैं जाग ही रहा था। मैं घूम रहा था, कि और क्या कर दूं। देख रहा था कि अब मैं यहां से जाने वाला हूं। क्या इन लोगों को कोई कमी नहीं होनी चाहिए? क्योंकि मैं अब तब आऊंगा, जब वहां अपनों की कुटिया के निर्माण कार्य की शुरुआत कर दूंगा। मुझे कितना समय लगेगा, कुछ पता नहीं। तो कोई कमी तो नहीं है इनके लिए। अब मैं चौबीस घंटे काम करता हूं। साथ वाले देखते भी रहते हैं। यहां वाले प्रत्यक्ष देखते हैं कि मैं दो बजे के बाद सोता हूं। इनकी एक नींद पूरी होती है, तो मैं इनको जागते हुए मिलता हूं, कि मैं और क्या कर दूं। कहने का मतलब ये है कि आप मेहनत को बढ़ाइए। आप क्या करते हो? चलो, मैंने बेईमानी छोड़ दी। ईमानदारी अपना ली। अब आपने क्या किया? मेहनत कम करना शुरू कर दिया। अब आप कह रहे हो कि ईमानदारी से पैसे कम आते हैं। आप एक बात बताइए। चौबीस घंटे दे रहे थे। अब आठ घंटे दोगे तो इनकम तो कम हो जाएगी। आप ईमानदारी में चौबीस घंटे देके देखो। कई गुना ज्यादा पैसे आएंगे। आप देके तो देखो। जिस तरीके से आप बेईमानी में मेहनत कर रहे थे, अगर उस तरीके से ईमानदारी में मेहनत करो, तो आपको लग रहा है कि उससे कम पैसा आएगा? नहीं लगेगा। लेकिन अभी आप सिकुड़ गए। अपने बच्चों में सिकुड़ गए, अपनी पत्नी में सिकुड़ गए, कि अब समय देने लगे। बड़ी शांति है, सुकून है। यह शांति-सुकून कोई काम का नहीं है। ये तो जानवर के पास भी है। शांति-सुकून तो तब होता, जब आप कहते कि पहले तो मैं अपने बच्चों को समय दे रहा था, अब मैं अनेकों बच्चों के लिए कुछ कर रहा हूं, अनेकों परिवार के लिए कुछ कर रहा हूं, अनेकों जरूरतमंद की सेवा कर रहा हूं। तब कोई मतलब था।
ईमानदार होने का मतलब ये नहीं कि अपने परिवार तक सीमित रहो। ईमानदारी के साथ सत्कर्म। सत्कर्म मतलब हमारे आसपास जरूरतमंद की सेवा। तो ईमानदारी से, शुद्ध, और ज्यादा से ज्यादा आप धन कमा सकते हो। बेईमानी में भी आप कई वर्ष समय लगाके तब जाके पैसा कमाते हो। ऐसा नहीं कि एक ही दिन उठाया और सामान बदलना शुरू कर दिया। व्यापार की शुरुआत आपने पहले ईमानदारी से की थी कि बेईमानी से सीखी? बेईमानी से सीखी। जब आप कस्टमर को अपने हाथ में लेते हो तो ईमानदारी से ही लेते हो। जीवन में जब पहले काम की शुरुआत की, जीवन को याद करो। बेईमानी से हम शुरुआत नहीं करते। हम सीधा बेईमानी नहीं करते। अगर हम सीधा बेईमानी करें तो कस्टमर हमारे पास आएगा ही नहीं। भरोसा तो ईमानदारी का होता है। जब हमने दुकान खोली, समाज को ईमानदारी ही दिखाई। की बेईमानी, लेकिन तुरंत नहीं की। धीरे-धीरे की। जिसके पास से काम सीखे, उधर से बेईमानी सीखी। जहां हम काम सीखते हैं, जिसके द्वारा सीखते हैं, भले वो बेईमान हो, लेकिन उसको हम ईमानदारी दिखाते हैं, तभी वो काम सिखाता है।
आप मुख्य बात पकड़ो। आप कितने भी बेईमान हो, लेकिन हमेशा ईमानदार नौकर चाहिए। जिसने आपको काम सिखाया, जब आपने काम सीखने की शुरुआत की, अगर उस समय बेईमानी दिखाते तो मालिक काम ही नहीं सिखाता। आपने बेईमान व्यक्ति से भी पहले ईमानदारी से काम सीखा। हमारे जीवन की शुरुआत ईमानदारी से होती है। जब आप किसी सेठ के यहां काम सीखने गए, तो अपने आप को ईमानदार ही बताया, कि बेईमान बताया? पहले ईमानदार बताया। ईमानदार बता के काम सीखा। फिर उसमें ये सीखा कि बेईमानी इसमें कैसे होगी। शुरुआत बेईमानी से सीधी नहीं होती। कर ही नहीं पाओगे। शुरुआत जीवन की ईमानदारी से होती है। फिर धीरे-धीरे हम बेईमानी करने लगते हैं। धीरे-धीरे लोगों का भरोसा जीतने लगते हैं। और धीरे-धीरे बेईमानी हमारी बढ़ती जाती है। और उसमें हम कितनी मेहनत करते हैं, वो देखो। ऐसा नहीं कि पहले दिन काम सीखने गए और कह दिया, हम तो बेईमान हैं, क्या मुझे रखोगे? आपको लगता है रखेगा? क्योंकि बेईमान सेठ को भी ईमानदार नौकर चाहिए। बेईमान आदमी को बेईमान पसंद नहीं। अगर मुझे किसी के द्वारा काम सीखना है, तो मुझे अपना स्तर ईमानदार का लगाना पड़ेगा। तभी वो काम सिखाएगा, नहीं तो नहीं सिखाएगा।
तो आप देखिए, बेईमानी में कितनी मेहनत करते थे और ईमानदारी में कितनी करते हो। अगर ईमानदारी में उतनी मेहनत कर दो, तो बेईमानी से कई गुना मिलेगा। लेकिन आप क्या करते हो? मैं तो आध्यात्मिक हो गया, मेहनत ही कम कर देते हो। अब खुद जोड़ो। चौबीस घंटे काम कर रहे थे। बच्चों को समय, परिवार को समय क्यों नहीं दे पाते थे? क्योंकि हर वक्त काम में लगे थे। पार्टी भी अगर कहीं कर रहे थे दोस्तों के साथ, तो उन्हीं दोस्तों के साथ जिनके द्वारा बिजनेस बढ़ता था। हर वक्त काम ही कर रहे थे, तो पैसे खूब कमाते थे। इसमें भी खूब मेहनत करो। लेकिन आध्यात्म जैसे आया, आदमी रुक जाता है। मेहनत को बढ़ा दो। बेईमानी का धन एक तरफ से आया, दूसरी तरफ दे रहे थे। ईमानदारी का आया तो टिकेगा।
आज यह स्थान बना। यह स्थान हम पहले दिन निकल के नहीं बना दिए। मैंने पहले बारह साल भ्रमण किया। जब बारह साल का भ्रमण हुआ, जब मुझे लगा मैं उस योग्य हो गया, तब मैंने अपनों की कुटिया का निर्माण किया। क्या मैं बारह साल पहले नहीं बना सकता था? मैं तो ज्योतिष था। बहुत आराम से मुंबई में आश्रम बना लेता। मेरे लिए कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी। लेकिन मैं उस लायक था ही नहीं। जिस कार्य के लिए निकला था, मैं उस लायक था ही नहीं। तो पहले मैंने अपने आप को उस लायक बनाया, फिर अपनों की कुटिया की स्थापना की। तो आप अपार मेहनत करो। सिकुड़ो मत, फैलाओ। अपने आप को सिकोड़ मत लो, कि मैं और मेरे बच्चे, मैं और मेरा परिवार। अपने आप को इतना फैला दो कि आप गिनती ना कर पाओ, आपके कितने परिवार हैं, कितने बच्चे हैं, कितने भाई-बहन हैं, कितनी मां हैं। आप गिन भी ना पाओ। लोगों के लिए जीना सीखो। महान व्यक्ति वही होता है जो लोगों के लिए जीता है। जो भी लोगों के लिए जीता है, वो महान होता है।
अपनी महानता को जागृत करना है, तो लोगों के लिए जीना पड़ेगा। बातों से बात नहीं बनेगी। ईमानदार कंजूस मत बनो। ईमानदार सत्कर्मी बनो, तब कल्याण होगा। सामने वाले की जरूरत, अपनी क्षमता के अनुसार, उसे सहयोग करो। और अपनी क्षमता को हमेशा बढ़ाओ। धन से, तन से, और समझ से। अपनी क्षमता बढ़ाओ। आप में अपार संभावना है क्षमता बढ़ाने की। अनलिमिटेड। आप अपने आप को उस परम स्थिति तक ले जा सकते हो। बोल के नहीं, करके। हम सिर्फ बोलते हैं। बोलने से कुछ नहीं होगा। करने से होगा। करने से परिणाम आएगा, बोलने से नहीं।
ईमानदारी में मेहनत करो। ईमानदारी में तो सबसे ज्यादा संभावना है आगे जाने की, आगे बढ़ने की। कुदरत भी सपोर्ट करती है। सब लोग सपोर्ट करते हैं। ईमानदार व्यक्ति के सामने बेईमान भी खड़ा नहीं होता। वो पीछे-पीछे बोलता रहता है। सामने आने पर चुप हो जाता है। ईमानदारी में इतना बल है।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 23 अगस्त 2026 #योगी · 2026-08-23