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प्रश्नोत्तर P6-0013 · भाग 6

किसी गुरु/मार्ग से भटकाए बिना कैसे रहें?

लेकिन हम जिसके लिए गए, वो बात करें तब। हम तो बस ऐसे ही चले जाते हैं। अगर हम वो बात करें तो हमें कोई नहीं भटका सकता। हमारा काम साध देगा, नहीं तो रुकूंगा नहीं, चला जाऊंगा। लेकिन मुझे पूरा नॉलेज होना चाहिए। पूरी जानकारी होनी चाहिए कि मैं किसके लिए गया। मुझे क्या चाहिए। अगर यह मेरे जीवन में पक्का है, तब मुझे कोई भटका नहीं सकता। लेकिन मैं खुद ऑप्शन में जी रहा हूं। ये नहीं तो ये सही, ये नहीं तो ये सही। तो आप भटकते ही रह जाओगे। जैसे आप कह रहे हो कि तुम्हें पता ही नहीं है। तुम लोग मुद्दे का ही नहीं पता था क्या? तो मुद्दे पे आओ। यह तो करना है। तो अब हो गया है, तो बस उसके अलावा कोई बात ही मत करो। मैं एक आश्रम में गया था, खोज में। मैं उस आश्रम में गया, वो व्यक्ति नहीं मिला। तो लोगों ने कहा कि आप खा लो, आराम से सोओ। रात थी। मैंने कहा, मैं यहां नहीं रुक सकता। जब वो व्यक्ति ही नहीं मिलेगा, तो मैं यहां रुक के क्या करूंगा। मैं रात भर, ठंड के महीने में, नर्मदा तट पे सोया, बिना बिस्तर के। क्योंकि वहां अगर मैं रुक जाता, तो शरीर की व्यवस्था के लिए रुकता। मेरी खोज तो वहां पूरी हो ही नहीं रही थी। तो मैंने कहा, जब मेरी खोज ही यहां नहीं है, तो मैं यहां रह के क्या करूंगा। तो मैं रात भर नर्मदा तट पे सोया, वहां नहीं रुका। एक रात मैंने अपनी जिंदगी की बर्बाद नहीं की। मैंने कहा, जब वो व्यक्ति ही नहीं मिलेगा, तो वो जगह व्यवस्था तो दे देगी मुझे। तो मैं रात भर किनारे सोया, क्योंकि किनारे मेरी खोज थी, और वहां मेरी खोज थी नहीं। तो हमें इस तरीके से समझ के जीना पड़ेगा। जहां मेरी खोज पूरी नहीं हो रही है, उस व्यक्ति का, उस जगह का, मुझे तुरंत त्याग करना चाहिए। त्याग ही परम सुख है, और ये त्याग आपको लेके जाएगा। कहीं दबाव में, कहीं संकोच में, हमें नहीं बैठना चाहिए। अगर मैं यहां बोल रहा हूं, आपको कुछ समझ में आ रहा है, तब तो बैठना ठीक है। लेकिन कहो नहीं कि हम ऐसे ही बैठे हैं। तब एक आदमी को आप धोखा दे रहे हो। कईयों को धोखा दे रहे हो, और कईयों को बढ़ावा भी दे रहे हो। क्योंकि आपको देखकर और लोग भी तो प्रेरणा लेंगे। उस व्यक्ति के पास जाएंगे। अगर नहीं समझ में आ रहा है तो सीधा कह देना, भाई आपकी बात मुझे नहीं समझ में आ रही है। जिसको समझ में आ रही है वो रुके। मैं तो चला। साफ सुथरी बात है। और मैं इसी में जिया हूं। मैं उस आश्रम में चाहता तो रात बिता लेता। लेकिन एक रात जिंदगी की बर्बाद हो जाती। क्योंकि वहां तो मेरी खोज खत्म। वहां तो जिसके लिए गया था, वह था ही नहीं। और तट पे मेरी खोज थी। वहां से जब निकला, तो खोज आगे बढ़ गई। कम से कम मैं अपने साथ तो था। अपनी खोज के साथ था। तो खोज मत छोड़ो। जब आप दबाव और संकोच में आते हो, तो वहां खोज छूट जाती है। अगर जरूरत है तो बैठो। या तो आप देने वाले हो, या लेने वाले। दो में से एक बनके, जहां भी हो, रहो। इसी में कल्याण है। अब आप देख लो कि मैं देने वाला हूं कि मैं लेने वाला हूं। ये पक्का करना पड़ेगा। लेकिन आप दोनों बनके घूम रहे हो। तो दोनों बन के घूमने वाले का कल्याण नहीं होता है। आप अगर कहीं हो तो आप एक हो, या तो देने वाले, या तो लेने वाले। अब ये आप तय करो कि जिस जगह मैं हूं, मैं देने वाला हूं कि मैं लेने वाला हूं। अगर देने वाले हो तो लेने की बात कतई मत करो। और लेने वाले हो तो देने की बात मत करो। कि भैया, मैं तो लेने वाला हूं, या तो मैं देने वाला हूं। दो में से एक पक्का करो। अगर दो में से एक पक्का कर लिया, इसी में जिए, तो आपका कल्याण पक्का। अगर समझ में नहीं आएगी तो कल्याण भी नहीं होगा, क्योंकि समझ ही विकसित होगी, तभी आपका कल्याण होगा। और आप अपनी समझ से समझेंगे, तब कल्याण होगा। अगर किसी दूसरे की समझ से चलेंगे, तो आप चल नहीं पाएंगे। आपकी समझ से ही आपकी यात्रा करनी पड़ेगी। किसी ने आपको पता बताया, आप समझोगे तभी आगे बढ़ पाओगे। अगर आप नहीं समझे, वो सही भी बता रहा हो, और आप वो भाषा नहीं समझ पाए, तो आप आगे नहीं बढ़ पाओगे। आपकी भाषा में बताने वाला आपको मिलना चाहिए। तभी आपकी आगे की यात्रा होगी। अगर वो सही भी बता रहा है, और आपको नहीं समझ में आ रहा है, तो आप आगे नहीं जा सकते। और मैं जहां हूं, उसका जिम्मेदार सिर्फ मैं हूं। मुझे किसी पर थोपना ही नहीं चाहिए। अगर मेरे साथ कुछ हुआ, तो उसका जिम्मेदार मैं हूं, वो नहीं। अगर वो सिर्फ होता, तो मुझ पे प्रभाव नहीं पड़ता। अगर मुझ पे उसके करने का प्रभाव पड़ रहा है, तो कहीं ना कहीं मैंने उससे अलग तरीके से उम्मीद बना के रखी थी। हमने उम्मीद ही क्यों बना के रखी? अगर उसने उम्मीद दी, उम्मीद तोड़ी, तो खत्म। उसने दिया, उसने तोड़ा, वो जाने। हमने उम्मीद क्यों बना के रखी थी कि वो ऐसा ही करेगा। हमारी उम्मीद ही हमारे दुखों का कारण है। हम अपने तरीके से उम्मीद क्यों बना के रखते हैं? उम्मीद ही सारे दुखों की जड़ है। अध्यात्म का आखिरी शब्द है, उम्मीद से मुक्त हो जाना। उम्मीद में ही सारा धोखा है। और उम्मीद हम अपने अपने तरीके से बना के रखते हैं। हमने क्यों अपने तरीके से उम्मीद बना के रखी? हमें उम्मीद से मुक्त होना है। और अगर मैं कुछ लेने गया हूं, तो उसके बारे में मुझे नॉलेज होना चाहिए। असली है तो नकली है। नकली ही सिद्ध करता है कि कहीं असली है। क्योंकि नकली, असली का आधार है। नकली ऐसे पैदा नहीं हो सकता। नकली सीधा पैदा नहीं हो सकता। असली, नकली का आधार है। और नकली से ये पता चलता है कि कहीं असली है। अब मेरी योग्यता के अनुसार ही मुझे मिलेगा। अगर मुझे नकली मिल रहा है, तो मैं भी उसी लायक हूं। कहीं ना कहीं हमारे अंदर पूर्णतः ईमानदारी नहीं है। कहीं ना कहीं हमारे अंदर बेईमानी है। नकली से सिद्ध हो रहा है कि कहीं असली है। नकली ही सिद्ध करता है कि असली कहीं छिपा हुआ है। हमारी पहुंच नहीं है। मुझे असली तक पहुंचने के लिए उस लायक बनना पड़ेगा। लेकिन मुझे पूरा नॉलेज होना चाहिए। मुझे पूरी जानकारी होनी चाहिए। अगर लक्ष्य का पता ही नहीं है, तो आपको कोई मार्ग ही नहीं बता सकता। आपसे कोई पता पूछे, और लक्ष्य ना बताए। आपको पूरी दुनिया का पता मालूम हो, उसे कहां जाना है यह ना बताए, और बोले मुझे जाना है, तो क्या आपको लगता है आप उसे पता बता सकते हो? अगर उसे नहीं पता हो कहां जाना है, आप उसे पता बता सकते हो? जब उसने कहा पूजा करो, तो मैं पूजा कर रहा हूं। इसका परिणाम क्या है? क्योंकि कुछ करने का यहां कुछ परिणाम है। अगर आपने कुछ किया, तो उसका परिणाम भी तो है। परिणाम आए ही। जब परिणाम मिला, तो दुख किस बात का? अफसोस किस बात का? परिणाम हमने अपने तरीके से उम्मीद रखे थे। नहीं। परिणाम आया, बात खत्म। हो सकता है वो वहीं तक दे सकता था। आगे जाओ। और कोई खड़ा है। उसके आगे भी कोई है। तो अगर कोई कुछ करने के लिए बोल रहा है, तो उससे परिणाम भी पूछ लो, भाई इसका परिणाम क्या है? तो आप देख लो, करने के बाद परिणाम आया कि नहीं आया। मैं एक बार करूंगा। परिणाम आया तो ठीक है, नहीं तो छोड़ दूंगा। लेकिन एक बार किसी की बात तो माननी पड़ेगी। यही तो जिंदगी है। एक बार तो मुझे किसी की बातों का भरोसा तो करना पड़ेगा। करने से पहले नहीं, करने के बाद परिणाम आएगा। तो करने के बाद अगर परिणाम आया, मुझे लगा कि ये ठीक है, तो मैं उस परिणाम के लिए और काम करूंगा, नहीं तो छोड़ दूंगा। इतना तो करना ही पड़ेगा। अगर आप कुछ खोज कर रहे हो, तो उसमें बहुत कुछ त्रुटियां होंगी। बहुत कुछ गलती होंगी। बहुत कुछ नुकसान भी होगा। आप बोरिंग ही कराते हो, तो क्या हर बोरिंग में पानी मिलता है? तो क्या अंदर पानी नहीं है? जहां आपने बोरिंग दो सौ, तीन सौ, चार सौ, पांच सौ, छह सौ फीट तक गई, क्या पानी नहीं है? आपकी ताकत खत्म हो गई। हो सकता है दो हजार फीट नीचे पानी था। लेकिन आप नहीं खोद पाए। अब आप वहां खोद दिए, जितनी आपकी सामर्थ्य है। हो सकता है सौ फुट पे ही पानी आ जाए। ऐसी जगह है। तो क्या वहां पानी नहीं था? पानी था, लेकिन आपकी सामर्थ्य नहीं थी। तो एक काम करो। जब आपकी सामर्थ्य नहीं है, छोड़ के, जहां आपकी सामर्थ्य है, वहां लग जाओ। मुझे अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही मिलेगा। आपकी जैसी योग्यता है, वहां आप हो। आपकी जितनी क्षमता है, आप वहां हो। आप जहां भी खड़े हो, आप अपनी योग्यता के अनुसार वहां खड़े हो। तो मुझे ये पता करना पड़ेगा कि मुझे जाना कहां है। ये जब तक नहीं पता करोगे, आप ऐसे ही घूमते रह जाओगे। आपको लक्ष्य पता ही करना पड़ेगा। आपके जीवन में लक्ष्य पक्का करना ही पड़ेगा। अगर लक्ष्य पक्का नहीं करोगे, तो पता क्या बताएगा? आपसे कोई बोले कि मुझे जाना है। आप तुरंत क्या पूछोगे? कहां जाना है? नहीं कि उसे पता ही बता दोगे। अब वो कहां जाना है, अगर बताने में सक्षम हुआ, तो आप पता बता दोगे। और आपको पता भी मालूम है, और वो बता ही नहीं पा रहा है कहां जाना है, तो आप कैसे पता बताओगे? जाना कहां है, आपको पक्का करना पड़ेगा। लक्ष्य आपको पक्का करना पड़ेगा। उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अनेक लोग आपकी सहायता कर देंगे। लेकिन लक्ष्य का पता आपको होना चाहिए। अगर लक्ष्य का पता नहीं है, तो क्या कोई सहायता करेगा? आप घूमते ही रह जाओगे। तो क्या चाहिए, ये आपको पता करना पड़ेगा। ये जब तक नहीं पता करोगे, तब तक ऐसे ही आप भटकते रहोगे। कभी इधर, कभी उधर। आपके प्रश्न में आया कि ऑप्शन होने चाहिए, और यह भी कि अगर मैं ऑप्शन देके चलूंगा तो मेरे अंदर स्टेबिलिटी तो आएगी नहीं। कहीं कहते हैं ऑप्शन नहीं होना चाहिए, कहीं कहते हैं ऑप्शन होना चाहिए। तो मैं आपको बता रहा हूं। अगर मेरे उद्देश्य की पूर्ति हो रही है, तो मुझे ऑप्शन की जरूरत नहीं। लेकिन अगर मेरे उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो रही है, तो मेरे पास ऑप्शन होना चाहिए कि मैं और कहीं चला जाऊं। मेरे उद्देश्य की पूर्ति हो रही है, तो मेरे सारे ऑप्शन को लेस कर देना है। तब मुझे नहीं जाना है। और तब अगर मैं जाता हूं, तो मुझे पूछना चाहिए कि मैं क्यों जा रहा हूं। अगर मेरे उद्देश्य की पूर्ति हो रही है और मैं और जगह जा रहा हूं, इसका मतलब ये मेरा उद्देश्य नहीं है। और मेरे उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो रही है, तो मुझे तुरंत चला जाना चाहिए। जब मेरे उद्देश्य की पूर्ति हो, तो वहां ऑप्शन लेस कर देना चाहिए, और जब मेरे उद्देश्य की पूर्ति ना हो, तो ऑप्शन पैदा कर देना चाहिए। जाने से पहले ऑप्शन लेके नहीं जाना। मैं तो जा रहा हूं। पहले से अगर ऑप्शन लेंगे, तो वहां स्टेबिलिटी नहीं आएगी। अगर वहां मेरा पूरा नहीं हो रहा, तब मुझे ऑप्शन ढूंढना चाहिए। ऑप्शन तो तब पैदा करूंगा, जब वहां नहीं होगा। जब मेरे उद्देश्य की पूर्ति हो, तो अगर ऑप्शन है तो भी लेस करूं। और मेरे उद्देश्य की पूर्ति नहीं है, तो मुझे ऑप्शन पैदा करना पड़ेगा। जैसे मैं उस आश्रम से निकला, तो नर्मदा तट पे सोया। जब मेरे उद्देश्य की पूर्ति नहीं है, तो मैं वहां क्यों रुकूं। मैं आगे निकलूंगा, तो मुझे ऑप्शन मिलेंगे। और जब तक मैं मूल तक नहीं पहुंचूंगा, तब तक मुझे आगे बढ़ते ही रहना है। आप रुक ही नहीं सकते। अगर आप ईमानदार हो और खोजी हो, तो आपका एक दिन भी कोई बर्बाद कर ही नहीं सकता। अगर एक दिन भी बर्बाद हुआ, तो उस दिन तक आपने कुछ मजा लिया, वहां कुछ उपयोग किया, आपकी कुछ ना कुछ जरूरत पूरी हुई। ऐसे कोई रुक ही नहीं सकता।

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