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प्रश्नोत्तर P6-0031 · भाग 6

बच्चे-मकान-गाड़ी सुप्रीम करने के बाद भी sufficiency का प्रश्न क्यों?

अपनी कमजोरी पे काम करना चाहिए। प्राइवेसी खत्म हो जाएगी, क्योंकि घर पर नहीं रख सकते, तो जिस व्यक्ति को काम पर रख रहे हो, उसके लिए कोई रूम ले दो, अपने घर से दूर। अगर ये क्षमता है, तो ये करना चाहिए, कि तेरी प्राइवेसी भी रह गई और मेरा भी काम हो गया। उसको कुछ दूर रूम दिला दो, अपने रूम से दूर, कि तू यहाँ काम करेगा, यहाँ खाए-पिए। और अगर उतनी योग्यता नहीं है, तो कह दो, आप अपना काम कर लो और हम अपना कर लेंगे। बस इतनी सी बात है। इतने में लड़ाई हो जाए, तो अगर इतना मूर्ख है सामने वाला, उसके साथ रहना ही नहीं चाहिए। अगर इतने में लड़ाई हो जाए, तो वहाँ तुरंत त्याग कर दो उसका। क्योंकि हम कुछ समझने के लिए काम कर रहे हैं। अगर ऐसा व्यक्ति इतने में लड़ ले, कि आप अपना काम कर लो। प्राइवेसी ही चाहिए, और मैं उसको रूम लेके नहीं दे सकता, और तुम्हें प्राइवेसी चाहिए, तो ठीक है। एक काम करो, आज के बाद आप अपना काम करो, मैं अपना काम करूँगा। तुम्हारी प्राइवेसी भी रह गई, और मैं अपना काम करूँगा। तो वो साधना ही रहेगा मेरे लिए। फिर उसका असर कुछ भी आए, क्या फर्क पड़ता है? उस डर के लिए तैयार रहो। परिणाम आना निश्चित है। तुम युद्ध में कूद ही गए हो, तो क्या आप सोचोगे चोट कहाँ लगेगी? लगने दो। और इतना सामने वाला मूर्ख है, तो उसके साथ जीवन ही नहीं जीना है। क्षमता देखो। दोनों रास्ते हैं। या तो उसे रूम दे दो दूर, तब वो काम करेगा। उनकी प्राइवेसी भी हो गई, आपकी भी। पैसा गाँठ मार के तो लेके जाओगे नहीं। धन है तो उसका सदुपयोग करो। और अगर वैसी योग्यता नहीं है, तो आप अपना-अपना काम करो। वो अलग घर में रहेगा। अपना काम करेगा, अपने रूम पे जाएगा। अगर एक ही बंगले में, ऊपर रहे या नीचे रहे या बराबर वाले कमरे में रहे, और प्राइवेसी फिर भी खत्म ही हो जाती है, तो ये गले का फँदा हो गया। तब अपना-अपना काम करो। बस, खत्म बात। आगे आने वाले परिणाम में जो भी आए, उसके लिए भी त्याग। परिणाम ये आ जाता है कि तू तो मुँह चढ़ा के देख रही है, और मैं अपना पैसा कमा रही हूँ, अपना काम। त्याग कर दो। हम अपनी उँगली तक काट देते हैं। इसमें कैंसर हो जाए, ठीक कराने का प्रयास करते हैं, और जब नहीं ठीक होता है तो कहते हैं काटो, क्योंकि मुझे रहना है। जहाँ मेरी समझ विकसित होना बंद हो जाएगा, मैं नीचे गिरूँगा, उस जगह को छोड़ दो। त्याग ही परम सुख है। जब मैं गिरने लगूँ, चाहे वो व्यक्ति हो, चाहे जगह हो, उसका तुरंत त्याग करूँ। जानवर तक चले जाते हैं। बाढ़ आती है तो जानवर भागने लगते हैं। जिस जगह के बिना वो रह नहीं सकते थे, वही जगह छोड़ देते हैं। बाढ़ आती है तो लोग अपना घर छोड़ के भागते हैं। और अगर बाढ़ ना आए, तो बोलेंगे, नहीं, ये जगह तो मैं छोड़ नहीं सकता। जब समझ की बात आए, कि मुझे अपनी उन्नति करनी है, उसमें अगर कोई भी बाधा आए, उसका त्याग करो। सारा काम छोड़कर, भोजन भी छोड़कर, अपनी समझ के लिए काम करो। अगर हमारी उन्नति में कोई भी रुकावट आए, उसको खत्म करो। क्योंकि मुझे आगे बढ़ना है। मेरा जन्म जिसके लिए हुआ है, वो मैं करूँगा। और आप रुकावट आओगे, तो हम आपको छोड़ देंगे। अपने टारगेट के लिए इतनी तत्परता तो दिखानी पड़ेगी, जो भी परिणाम आए। अपने कल्याण के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ। गुरु शब्द है। गुरु ने बताया कि आप अपने आचरण का सुधार करो। उसके लिए कुछ भी त्याग कर सकते हो। आप तो पैसे दे रहे हो। पैसे दिए तो सेवा थोड़ी न हुई। अगर उसे नहीं दो, तभी बात और है। वो तो दे रहे हो। उसको भी तो जरूरत है। जैसे-जैसे आदमी बूढ़ा होता जाता है, वो अपनी जरूरतों पे पैसा खर्च करना और कम कर देता है, डर से कि मैं कमा नहीं रहा। पूछो तो कहते हैं, आपके लिए ही तो। कहते हैं, हमें तो चाहिए नहीं, हम तो सक्षम हैं। तो आप अपने पे खर्च करिए। ड्राइवर रखिए। कहाँ लेके जाओगे? इतना जोड़ लिया है, तो अपने ऊपर खर्चिए। हम खुद आगे की यात्रा के चक्कर में हैं। आप अपने आप को समय दो। और उसे भी तो जरूरत है, सामने वाले को। वो भी तो आपको धन्यवाद देगा। कुछ बढ़ा के ही दो, कि काम बस अच्छे से करना।

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वीडियो: दिल्ली में पहला सत्संग पार्ट 3 #योगी · 2026-02-02