प्रश्नोत्तर P6-0036 · भाग 6
दूसरे के प्रश्न में टोकना / कमजोर समझना सही?
यहाँ बातचीत ना करें। अगर इसको वो समझा सकते थे, तो इसे यहाँ नहीं आना पड़ता। आप इसे समझिए। अगर वो समझा सकते थे, तो उसे यहाँ नहीं आना पड़ता। आप उसे समझाने दीजिए। बाकी कुछ बचा, तो घर में जा के समझा देना। बाप होने का मतलब ये थोड़ी न है। बाप हो तो क्या हुआ? ये रिश्ते तो हमें दबा के रखते हैं। कहीं बाप का दबाव, कहीं माँ का दबाव, कहीं किसके दबाव में एक आदमी की जिंदगी चली जाती है। हम इसलिए बोले चुप के, क्योंकि दो समझ रहे हैं। इनको बोलने दो। ये बात कर रहे हैं, कुछ समझ रहे हैं। इन्हें मौका दो।
आप हमारे पास आए। आप अपने प्रश्न करो। सबका व्यक्तिगत जीवन है। और आप यहाँ से जाओ, तो खूब अपने घर पे बात करो। इसका प्रश्न इसके तरीके से रखने दो। क्योंकि प्रश्न में भावनाएँ होती हैं। आप ये मत समझो, ये नहीं रख पा रही है। यही तो बात है। हम सबको अपने से कमजोर समझते हैं। जब आपने प्रश्न किया, तो इसने एक बार भी नहीं बोला। वो चाहे एक घंटा लगे, चाहे दो घंटा लगे। ये मेरा काम है। यह उसका काम है। उसे प्रश्न तो करने दो। हमें क्या होता है, बोलने ही नहीं दिया जाता। तू चुप रह, हम प्रश्न करें। लेकिन प्रश्नों के साथ भावनाएँ होती हैं। अब आपके पास समय है, आप बोलिए। उसकी गलती के कारण आपके ऊपर नहीं। उसकी गलती है, उसको रिजल्ट मिला। आप ही मत बोलो कि अब जाने दीजिए, समय आज बहुत कम है। इनको पूरा मौका दिया जाए।
गोयल जी, अगर देखें तो वो उनका बेटा ही गुरु है। लेकिन उन्होंने कभी बेटे की बात नहीं मानी। गुरु का मतलब क्या है? मेरी गलतियों पे टोकना। लेकिन अब यहाँ क्या हो गया? बाप मैं हूँ, तू क्या जाने? लेकिन वो जान रहा है कि तुम कहाँ गलती कर रहे हो। काश उसे स्वीकार करते। वो यही कहता है कि आपमें अहम है। मैं तीन दिन से देख रहा हूँ। और ये आपका हितैषी है। ये पुत्र आपका ऐसा है कि मैंने ये देखा। क्योंकि मेरे पास आज समय नहीं है, इसलिए जल्दी जाना है, तो जल्दी मतलब समय से निकल जाना है। मैं आपसे यह कह रहा हूँ कि मैं तीन दिन से देखकर बोल रहा हूँ, कि कहीं न कहीं आपका हित चाहता है, इसलिए टोकता है। लेकिन बात यह है कि ये मेरा बेटा, ये मुझे कैसे टोकेगा? बता तो रहा है गलती। गलती समझ में भी आती है। लेकिन स्वीकार करने में बड़ी तकलीफ होती है, क्योंकि मैं बाप हूँ। ये बाप वाला अहंकार होता है, वो गिरा देता है। ये बड़ा खतरनाक है, गोयल जी। ये बहुत खतरनाक है, कि मैं बाप हूँ, मैं तेरी माँ हूँ। ये गिरा देता है। काश हम सामने वाले की भावनाओं को समझें। कि वो आपको पीड़ित नहीं देख सकता। कहीं न कहीं आप अपने आचरण से पीड़ित हो। वो आपकी पीड़ा नहीं बर्दाश्त कर पा रहा है। वो आपको कुछ बताना चाहता है।
अगर कह दिया चुप, तो इसका मतलब, आप जिसके पास आए हो कुछ सीखने, अगर उसने कहा कि चुप, तो कुछ तो बात होगी, तो चुप हो जाओ। अगर उसी समय चुप हो जाते, तो इसके आँखों में आँसू नहीं होते। एक बार में चुप हो जाते। लेकिन इतना हो गया कि उन्हें हटाना पड़ा, और इसके आँखों में आँसू हो गए। तो इसके आँखों में आँसू का जिम्मेदार कौन है? उसका पिता है। आप ये ना समझना कि ये पहली घटना है। वो व्यक्ति इसका आदि नहीं है। ये पहली घटना नहीं है। जब वो व्यक्ति यहाँ नहीं चुप हो पाया, तो वो फिर अपने परिवार में, अपने जितने सदस्य उसके नीचे होंगे, उसके साथ वो क्या करता है? शोषण करता होगा। इसलिए मैं गोयल जी से कह रहा हूँ, अगर तीन दिन में उसने ये बात कही, तो तीन दिन पहले क्यों नहीं कहा? इस पर आप चिंतन करो। क्या दबाव था, क्या वो संकोच था, कि मेरे हित की बात वो मुझसे ना कह सका। कौन सा ऐसा दबाव था? और क्या दबाव तीन दिन में खत्म हो गया? तीन दिन में बोल ही दिया। आखिर ऐसा दबाव क्यों? क्यों नहीं हमारे साथ रहने वाले हमसे खुल के बात करते हैं? क्यों हम रिश्ते का जोर देते हैं? क्यों उसे दबा के रखना चाहते हैं? क्यों?
आप देखते हो, हमारे चाहे कुटिया में, चाहे मुझसे, लोग खुल के बात करते हैं। कभी आपको लगा, कोई मुझसे दबता है? यहाँ आने वाला हर व्यक्ति, चाहे जैसा भी हो। आपको लगा, कोई दबाव में मुझसे बात कर रहा है? तो ये आप अपने आप से पूछिए, कि मेरे सामने, जो भी आसपास रहे, वो खुल जाना चाहिए। इसका जवाब आप खोजिए। इतने दिन पहले क्यों नहीं बोल पाए?
आपके स्वभाव से ही दबाव पैदा हो जाता है। जो आप बोल रहे हो, यही छोड़ना है।
तीन दिन में ये बात कहा, तीन दिन पहले क्यों नहीं कह पाया? कहीं न कहीं तो कोई तो दबाव होगा। आज देखो, इसके पिता की वजह से कितना पीड़ा। लेकिन पिता को थोड़ी पता है। वो तो अलग पीड़ा में झेल रहा है, कि मुझे कितनी पीड़ा हुई, मेरा अपमान हो गया। लेकिन तेरी वजह से कितना मानसिक रोई यहाँ पे, वो नहीं देखा। आप समझ इसलिए पा रहे हो कि आप अलग हो।
हम सामाजिक प्राणी हैं। हमें माहौल को देखकर बोलना चाहिए। सारी चीज देख के। माहौल बोलने लायक है कि नहीं है? और कहीं न कहीं हमारे में गड़बड़ी है, तभी तो हम उस परम आनंद से वंचित हैं। कुछ तो है। वो गड़बड़ी निकालो। उसके लिए बातचीत हो रही है। यहाँ पे किसी को सिद्ध करने के लिए बात नहीं हो रही। कौन अच्छा है, कौन बुरा। वो गड़बड़ी निकल जाएगी। अगर कोई बात तीन दिन में इनडायरेक्ट कही, तो आखिर वो डायरेक्ट मुझसे क्यों नहीं कह पाया। इस पे चिंतन करना है। क्या ऐसा मेरा दबाव था? क्योंकि वो कहना तो चाह रहा था, मौका देखते उसने कह दिया।
ये मेरा अहम है, कि मैं एक घंटा ही बैठ सकता हूँ।
आप बहुत सज्जन व्यक्ति हो। आपकी समझ अच्छी है। आप एकदम साफ-सुथरा बोलते भी हो। आपके शब्दों में मिलावट नहीं है। आप ईमानदार व्यक्ति हो। इसीलिए मैं आपका सम्मान भी करता हूँ। लेकिन आपने कहा वो अहम, उससे हटाना बहुत जरूरी है। वो तो कमी है।
आपने उसे डांट के भगा ही दिया। अब वो राग-द्वेष से तो निकला है नहीं। एक आदमी को आपने और अपने विपरीत में खड़ा कर दिया। अभी तो औरों को तो हटा नहीं पा रहे, एक को खड़ा कर दिए। आपने एकदम सही बोला। लेकिन बोलने की जगह यह नहीं है। यहाँ तो मैं बैठा हूँ बोलने के लिए। अगर वो कुछ गलत करता, तो मैं उसे बोलता। आपने क्या किया? जल्दबाजी कर दिया। एक शत्रु और तैयार कर दिया। अब वो तो चला जाएगा, पंजाब। लेकिन पंजाब से नेगेटिव ऊर्जा फेंकता रहेगा। आप समझो। उसकी ऊर्जा काम करेगी। क्यों काम करेगी? एक व्यक्ति सीनियर बैठा था, वो मना कर रहा था, उसको इग्नोर कर दिया आपने। इसलिए काम करेगी। अगर वो मेरी भी बात नहीं मानता, और उसको धक्का भी मार के भगाते, तब आपका असर उठ जाता। उसकी नेगेटिव ऊर्जा काम ही नहीं करती। लेकिन मौका मुझे देना चाहिए, इसका ये करने का। और जब अगर मुझसे नहीं होता, मैं असफल हो जाता, और अगर आप तब करते, तो उसी समय आपका स्तर उठ जाता। मेरा उतावलापन है। ये बहुत ज्यादा है। मैं सेकंड नहीं लगाता। तीन दिन अपना निर्णय देने के लिए। और इतनी बात इसलिए हो रही है कि आपमें बदलाव आए, और आपका आत्मिक कल्याण हो, आप परम आनंद को उपलब्ध हो। इसलिए बात हो रही है। हम इसके पिता को ऐसे भगाए थोड़ी न। ऐसे भगाए, उसमें बहुत बदलाव आएगा। उसी की जरूरत थी। अगर उसको सम्मान की जरूरत होती, तो मैं इतने पे बोलता ही नहीं। वो इसी से सुधरेगा। उसे धक्का मारने वाला आदमी चाहिए।
मेरे अंदर यही कमी है कि मैं जो निकलता है, वो सेकंड भी नहीं लगाता। मेरी ऐसी आदत बनी हुई है कि मैं कोई गलत चीज देखता हूँ, तो तुरंत निकलती है। जरूरत है कि नहीं है, वो पता नहीं लगती। बस निकलती है। क्योंकि आप भी आए हो। चाहे वो आया है, मेरे लिए आएगा। अगर वो कुछ गलत करेगा, तो मैं उसे रोकूँगा। जैसे मैंने कहा, तुम जाओ। वो नहीं जा रहा था। मैंने कहा, प्रोफेसर इसे निकालो, और प्रोफेसर ने तुरंत निकाल दिया। तो कहने का मतलब है, अगर वो मेरे पास आया, आप मेरे पास आए हो, तो पहले तो मैं आपसे बात करूँगा। अगर कुछ गड़बड़ी कर रहे हो, अगर आप नहीं मानोगे, तो मैं किसी और को बोलूँगा। मेरी ड्यूटी नहीं है। आपकी ड्यूटी इतना है कि आप उसे सम्मान दो, कि इतनी दूर से वो आया है। आपने सत्संग रखा है, तो आप उसे सम्मान दो। गलती करेगा, तो मैं हूँ। तो इस तरीके से आपको नहीं बोलना चाहिए था।
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