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प्रश्नोत्तर P6-0038 · भाग 6

मूल तक पहुंचना है पर जीवात्मा में बल नहीं / कमजोरी — क्या करें?

जब आने से पहले ही कहा था कि मैं तुझे हर पल दूँगा। सोलह को मैंने उस भाव को छोड़ा, और सत्रह को तुम्हारा आना हो गया। तुरंत इसने वकालत छोड़ी, और तुरंत आ गई। पहले कहा था कि कई साल लगेंगे। हमने कहा, कई साल क्यों? फिर महीना। महीना तो दिन। तो तुरंत फैसला हो गया। और आपने ये देखा, कि हर पल, जब भी आप मुझे चौबीस घंटे में पुकारते हो, मैं मौजूद हूँ। मैं हर पल आपको देता हूँ। जब भी आप पुकार रहे होगे, आप मुझे कभी नींद में नहीं पाए होगे। कल सात घंटे के ऊपर सत्संग चला, और लगभग रात को डेढ़-दो घंटे मुश्किल सोएँगे। सोए, और प्रश्न आया, और फिर घंटों सत्संग चला। अब सोचो, मैं उसके बाद कितना सोया, और फिर यहाँ पर बोल रहा हूँ। मुझे नींद इतनी आती नहीं। मेरे काम से बहुत प्रेम है मुझे। बस एक बार मुझे कोई पुकार तो ले। मैंने इसको कहा, मैं हर पल तुझे दूँगा। मेरे लिए तो बस इतना ही आराम है, कि जिसके लिए तू मिली है, वो हो जाए। तेरा कल्याण। बाकी आराम की तो मेरी कोई इच्छा है नहीं। मेरा भाव एक ही रहता है, कि बस आपका कल्याण कैसे हो जाए। बस यही भाव रहता है। तो हर पल पहले तुम्हारे लिए, बाद में मेरे लिए। मैंने तुमको कहा था, मेरी जिंदगी कहाँ गई? पहले खोज में, फिर बाँटने में। फिर एक साल वहाँ गई, फिर आप आए। मैंने कहा, हर पल आपको दूँगा। बस आपका कल्याण हो जाए। फिर लोगों में। तो मुझे तो आराम की इच्छा ही नहीं है। मेरी तो आराम की कोई इच्छा ही नहीं। मेरा आराम उसी दिन होगा, जिस दिन आप पहुँच जाओगे। एक तो इस भाव को खत्म कर दे, कि जीवन में सब कुछ था और मैं छोड़ के आई हूँ। वो नहीं है। ये तुम्हारी अज्ञानता है। बहुत अज्ञानता है। क्योंकि होता तो मैं बता देता। उसके अंदर ये है ही नहीं, कि मैं छोड़ के आई। क्योंकि उसे छोड़ना ही था। उसके पास ऑप्शन नहीं है। दूसरा, सारे ऑप्शन खत्म करने हैं। पीछे नहीं जाना। और इसके अलावा नहीं। वो पीछे जाएगी भी नहीं। तू कभी नहीं जाएगी। तू जब पहले दिन आई थी, पहली बार आई थी मेरे पास, उसी समय हो गया था, निश्चित। ये बात मैं कहता हूँ। ये कभी नहीं जाएगी। अब ये आगे ही जाएगी। पीछे जा ही नहीं सकती, क्योंकि इसके आगे-पीछे मैं हूँ। तो ये पीछे तो जा ही नहीं सकती। ये आगे ही जाएगी। इसको कोई पीछे बुला ही नहीं सकता, और यह खुद नहीं जा सकती। यह अब जाएगी तो सिर्फ आगे। वो चाहे उसके लिए इस शरीर को भी छोड़ना पड़े। ये जाएगी तो मूल में ही अब यात्रा करेगी। ये चाहे शरीर को भी इसे छोड़ना पड़े। बस, इसका जहाँ हित होगा, ये वही अब जाएगी। और ये जाएगी तो अपने आत्मिक कल्याण के लिए जाएगी। यह पीछे नहीं जा सकती। ये ऑप्शन खत्म हो गया।

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वीडियो: दिल्ली में पहला सत्संग पार्ट 3 #योगी · 2026-02-02