प्रश्नोत्तर P6-0078 · भाग 6
मेरे अंदर अब संकल्प नहीं चलता। जहां होती हूं, वहीं उपस्थित होती हूं। यह कौन सी स्थिति है, आगे कितना बढ़ना है, और बैठते समय क्या करना चाहिए? तीन दिन तक आंख का दृश्य रहा, रीढ़ की हड्डी से रोशनी ऊपर चढ़ी, सहस्रार पर शिव दिखे, फिर आज्ञा चक्र से देवी-देवता निकलते रहे, और शरीर में ऊर्जा घूमती है। इनका क्या अर्थ है? क्या फिर से विराट स्वरूप वाली पुरानी स्थिति में लौटना चाहिए?
जिस स्थिति में आप हैं, जैसा बता रही हैं, बस उसी में स्थिर रहें। न आगे बढ़ना है, न पीछे हटना है। अगर आपको ऐसा लग रहा है कि आप उसमें हो गई हैं, तो बस आप उसमें बने रहिए। न आगे जाना है, न पीछे जाना है। बस उसमें स्थिर रहना है, और इंतजार करना है। जब यहां बैठो, तो निरसंकल्प स्थिति में ही रहो।
जब आप अपने स्व की तरफ बढ़ती हैं, तो बहुत सारी शक्तियां दिखती हैं। आप बस दिखने दो। कभी देखने का भाव मत लाना कि फिर से मुझे दिख जाए। इससे आपकी स्थिति ऊपर उठ रही है। लेकिन इसमें कभी यह मत जानना कि मुझे फिर दिख जाए।
आपको अपने आप में स्थिर रहना है। मेरे सामने कुछ भी आए, मुझे विचलित नहीं होना है। न उसमें जाना है। जाने का मतलब यह कि फिर दिख जाए। आप जो स्थिति पाना चाहती थीं, जिसे आप आत्मसाक्षात्कार समझ रही थीं, विराट स्वरूप जो आपने देखा, उसी में फिर आना चाहती थीं। वही तो बात है। बस आप अपने आप में बने रहिए। मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे रूप से मुक्त होना है। क्योंकि अगर मुझे कुछ दिख रहा है, इसका मतलब देखने वाला मैं हूं, और जो दिख रहा है वह अलग है। और जब तक मैं देखने में हूं, तब तक उपलब्धि नहीं होगी।
जैसे जब तोतापुरी रामकृष्ण परमहंस को ज्ञान करा रहे थे, तो काली मां का रूप आ जाता था। वह रूप ज्ञान होने में बांधा था। तब उन्होंने तरीका बताया कि किस तरीके से आप इस रूप से मुक्त हो सकते हो, तभी ज्ञान होगा। तो मुझे किसी रूप में लिप्त नहीं होना है। रूप आ रहा है तो आए, मुझसे मतलब नहीं। और अगर आपने फिर इच्छा रखी कि मुझे फिर दिख जाए, इसका मतलब उस रूप में आप फंस गईं। अब आगे बढ़ोगी नहीं, जब तक वह इच्छा बनी रहेगी। वह दिखे या न दिखे, बाद की बात है। लेकिन आप फंस गईं। ऐसी इच्छा न जगे कि मुझे फिर ऊर्जा ऊपर से नीचे जाए, बड़ा अच्छा लगा। शरीर जागृत हो रहा है। हमारे सब शरीर खुलते हैं। बहुत सारी चीजें होती हैं। कभी करंट जैसा लगता है, कभी शरीर में पूरा घूमने लगता है, क्योंकि सब खुलेगा। लेकिन वह अपने आप होगा। मुझे कुछ नहीं करना है। और दोबारा यह इच्छा भी नहीं रखनी है कि ऊर्जा इधर से उधर जाए और मैं वह देखूं। नहीं तो आप वहीं रुक गईं। फिर आपने अपने आप को रोक लिया। बस यही भाव बनाकर रखें कि मुझे कुछ नहीं चाहिए। आत्मसाक्षात्कार के अलावा कुछ भी नहीं।
जहां रूप नहीं, रूप से परे, निराकार। कुछ भी नाम दे दो। हम रूप में हैं, इसलिए निराकार कहते हैं। लेकिन उसे भी कहीं न कहीं देखा गया है। निराकार हम इसलिए बोलते हैं कि इस स्थूल शरीर से नहीं देख सकते। लेकिन उसे भी देखा जा सकता है।
विधियां गुलाम बनाती हैं। विधियों से मुक्त हो जाओ। कोई भी विधि हो, आपको गुलाम बनाएगी। इसका विशेष ध्यान दो। नहीं तो जिंदगी भर पवित्र आत्मा, प्योर सोल, करते हुए खत्म हो जाइए। बहुत लोग खत्म हो जा रहे हैं। कर्म के सिद्धांत को समझो। ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग अपना लो। अगर कल्याण चाहते हो, तो यही मूल मंत्र है। और यह समझ में भी आता है।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 31 मई 2026 #योगी · 2026-05-31