प्रश्नोत्तर P6-0156 · भाग 6
कृष्ण गीता में कहते हैं मेरी शरण में आ जाओ। इससे पहले यह भी कहा कि सब में मैं हूँ। अगर मैं कृष्ण की प्रतिमा या चित्र की तरफ जाता हूँ तो भी मैं मेरा में ही जा रहा हूँ। फिर एकं शरणं का क्या अर्थ है? भगवान कोई व्यक्ति है या पद?
कृष्ण जब गीता में कह रहे हैं कि मेरी शरण में आ जाओ, उससे पहले उन्होंने यह भी कहा कि सब में मैं हूँ। फिर वे कह रहे हैं, मेरा को छोड़ो और मेरी शरण में आ जाओ। अगर इस शरीर के द्वारा, इस पिंड के द्वारा, तुम कृष्ण की प्रतिमा की तरफ जा रहे हो, कृष्ण के चित्र की तरफ जा रहे हो, तो भी मेरा में ही जा रहे हो, और कह रहे हो सब में मैं हूँ। वे यह कह रहे हैं कि मेरी शरण में आओ। मतलब तुम में भी तो मैं हूँ, तो बस अपनी शरण में हो जाओ। तुम समझ नहीं पा रहे।
मामेकं शरणं व्रज। एक शब्द भी आया, एकं शरणं। एक तो फिर एक ही है, अलग थोड़े है। जैसे ही तुम उधर गए, बाहर गए, तो दो हो गए। अंदर ही रहे तो एक रहा। लोग यह बात समझ नहीं पाते। कृष्ण की प्रतिमा को पकड़ लेते हैं। एक अलग हो नहीं सकता। स्वयं में ही पाना है। एकं का मतलब ही एकं होगा। स्वयं में हो गया। गड़बड़ी यह कर रहे थे कि नहीं समझ पाते। उस एक को हम अलग समझ रहे, कि कृष्ण एक की शरण में, अपने से अलग। वे कह भी तो रहे हैं, सब में मैं हूँ। बस बात खत्म।
लोगों को क्या करना था? माल कमाना था। भ्रमित कर दिया। जब भ्रमित नहीं होगे तो माल कैसे छोड़ोगे। डरे रहोगे तभी माल छोड़ोगे। रास्ते में जा रहे हो, कोई कहे सामान दे दो। दोगे क्या? और बंदूक कान पर रख दे तो फटाफट सारी ताकत गई, ले लो, जल्दी दे दिया। बंदूक न हो और कोई दे दो कहे, तो लड़ाई होगी, झगड़ा होगा। जब तुम्हें लगेगा मैं कमजोर हूँ और यह बलवान है, तभी दोगे। जिस दिन पता चल जाएगा कि मैं मजबूत हूँ और यह कमजोर है, उस दिन नहीं दोगे। इसलिए ये तुम्हें हमेशा कमजोर बनाकर रखते हैं।
पहले कहते हैं एक ही ब्रह्म से सब है। फिर कहते हैं राम भगवान, कृष्ण भगवान। तो तुम क्या हो? क्या मेरा परमात्मा अलग है और उनका अलग है? एक तरफ कह रहे हो एक ही ब्रह्म से सब है। दूसरी तरफ अवतार बताते हो राम का, और मैं वही कह रहा हूँ। फिर हमारा परमात्मा अलग है क्या? परमात्मा दो हों तब तो बात अलग है। वे कह रहे हैं अवतार है, तो मैं क्या हूँ? मेरा परमात्मा क्या कमजोर है, उनका मजबूत है? क्या दो परमात्मा हैं? एक तरफ एक ही ब्रह्म से सब है, दूसरी तरफ तुम सामान्य हो। जिस समय राम और कृष्ण की बात हो रही है, उस समय राक्षस भी ताकतवर थे। पूरी प्रकृति ऐसी थी। ऋषियों को सताते थे। ताकत की बात कर रहा हूँ। सताते थे, पर ताकतवर भी थे। जिसने अपने आप को समझा, वह अवतरित। जिसने नहीं समझा, किसी और को समझना चाहता है, वह सामान्य है। बस इतनी सी बात है।
भगवान एक पद है। जैसे कोई गाड़ी चला रहा है तो ड्राइवर एक पद है। स्कूल में कोई शिक्षक का काम कर रहा है तो शिक्षक एक पद है। वह शिक्षक नहीं है, एक पद है, योग्यता से मिला है। वैसे जिसने अपने आप को इस भवसागर से निकाल लिया, उसे भगवान की पदवी दी जाती है। भगवान कोई व्यक्ति विशेष नहीं। जिसने अपने आप को भवसागर से निकाल दिया, उसे भगवान कहते हैं। जैसे नौकरी पकड़ लेते हो तो कहते हैं, देखो साहब जा रहे हैं। कुछ साल पहले साहब नहीं बोल रहे थे। एक पद है। भगवान एक पद भी है।
भग का मतलब है छुड़ाने वाला। जो अपने को जन्म और मरण से छुटकारा दिला दे, वो भगवान होता है। बस यही है। लोगों ने बहुत भ्रमित कर दिया। छोटे बच्चों को कहते हैं, ये तो वास्तव में भगवान के रूप हैं, क्योंकि उनमें राग द्वेष नहीं होता, मोह, शक्ति की इच्छा, अपेक्षा नहीं होती। हम माता पिता को, शिक्षक को, गुरु को, डॉक्टर को भगवान का स्वरूप मानते हैं। बच्चों में अभी अवगुण नहीं है, इसलिए। संत भगवान, गुरु भगवान। भगवान एक पद भी है, एक पदवी। जैसा काम किया, वैसा पदवी दे दी जाती है। पद भी तुम्हारे कर्म के उदय से आता है।
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