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प्रश्नोत्तर P7-0020 · भाग 7

जरूरत में जीना क्या अभ्यास है? व्यक्ति की वास्तविक जरूरत कितनी है?

यह अभ्यास का विषय है क्या? समझ के जी रहे हो तो अभ्यास नहीं बोल सकते। अभ्यास तो एक आदत है। इसे अभ्यास भी नहीं बोल सकते, क्योंकि आप अपनी समझ से कर रहे हो, मेरी समझ से नहीं। नहीं करना है। पहले कर रहे थे, अब नहीं करना है। बात खत्म। कोई नया अभ्यास थोड़ी करना है। पुराने अभ्यास को छोड़ना है। पुराने, जरूरत से ज्यादा में जी रहे थे। अब उसे छोड़ना है। तो यह अभ्यास नहीं। अभ्यास से मुक्त होना है। अभ्यास तो करके कर लिए थे। छोड़ना है। और यह छोड़ना। बहुत सारे लोग गंभीरता से पूछते हैं, भाई इसे कैसे छोड़ें। मतलब नहीं। सिर्फ जरूरत में जीना है। बस हो गया। क्या जी लिया। खूब खा लिए, खूब उड़ा लिए, खूब कर लिया। अब चलो जरूरत में जी के देखते हैं। एक नया जीवन का अनुभव। यह मौलिक चिंतन है। एक व्यक्ति की वास्तविक जरूरत बहुत न्यून है। इतनी कम है कि उसके लिए चौबीस घंटे बर्बाद करना बेवकूफी होती है। एकदम। और हमने चौबीस घंटे को भी कम समझ लिया है, अपने संधान के लिए, अपने कार्यक्रमों के लिए। तो वह हमारी जरूरत नहीं है। कुछ और है। जरूरत से ज्यादा हो रहा है।

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वीडियो: आध्यात्म को ना जानते हुए ईमानदारी सत्कर्म के साथ क्या आत्मज्ञान संभव है ? #livesatsang · 2025-03-13