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प्रश्नोत्तर P7-0092 · भाग 7

हम सरकारी नौकरी से अभी रिटायर हुए हैं। अब उस पैसे का क्या करना चाहिए? मैं उसे सत्कर्म में लगाना चाहती हूं, पर घर के दूसरे प्राणी सहमत न हों तो क्या करें? उस पैसे पर मेरा हक है या उनका? जरूरतमंद पात्र है या नहीं, यह कैसे पता चले? कई संस्थाएं सेवार्थ में लगी रहती हैं, क्या उनके माध्यम से भी यह कार्य हो सकता है? वृद्धाश्रम में जो गलत देखा, उसे बताना चाहिए या नहीं?

उस पैसे को ईमानदारी से सत्कर्म में लगाओ। जरूरतमंद की सेवा करो। और क्या करोगे? परिवार के और सदस्य भी इसी सहभागिता में होंगे, तभी यह कार्य आगे होगा। जो पैसा सरकार दे रही है, वह आपके काम का दे रही है। आगे आप चाहती हो कि मैं सत्कर्म में लगाऊं, और घर के दूसरे प्राणी सहमत न हों। उसमें और प्राणी से क्या मतलब है? हमें उद्धार अपना करना है, या और प्राणी का करना है? पैसे पर मेरा हक है, या उसका हक है? पहले देख लो। उसका हक है तो छोड़ दो। आपका हक है तो जहां लगाना है, आपकी मर्जी। जितनी उसकी जरूरत है रोटी के लिए, उसको दे दो। उसके पास है तो मत दो। जहां आपको लगे कि बहुत जरूरतमंद है। भूखे को भोजन, प्यासे को पानी, कपड़ा, जिस लायक आप हैं। आप समाज में करिए, अगर निकलना है तो। घर वाले तो कुछ भी कहेंगे। कल्याण अगर आपको करना है, तो आपको इस तरीके से करना है। यह सबसे तेज रास्ता है और आसान रास्ता है, जरूरतमंद की ईमानदारी से सेवा। सामने वाले को जरूरत नहीं और आप जबरदस्ती थोपो, तो कोई मतलब नहीं है। यह पात्र है या नहीं, वह जब आप करोगे तब समझ में आएगा। जब आप नौकरी पर गई थीं तब कुछ पता था क्या? जब आप करने लगीं, सब पता चल गया। वैसे ही जब आप करने लगोगे, कई लोगों को भोजन कराओगे, तो समझ में आएगा कौन पात्र था और कौन नहीं था। कई लोगों को कपड़ा दो, उसकी फीलिंग से समझ में आ जाएगा। जब वह आपकी आंखों में आंख देखेगा, तब समझ में आएगा कि इसकी जरूरत कितनी थी, एक कंबल के लिए कितनी व्याकुलता थी, क्या इसने कई दिन से ठंड में रात काटी थी। भोजन कराओगे तो उसके चेहरे से समझ में आ जाएगा कि कितने समय से भूखा है। यह तब पता चलेगा जब कराओगे। बिना कराए ही सब समझना चाहती हो, तो समझ में नहीं आएगा, क्योंकि एहसास कराने के बाद पता चलता है। उनकी आंखों में देखकर, जब करोगी तब समझ में आएगा। आपको ढूंढ ढूंढ के करना होगा। उनके पास जाना होगा, उनसे मिलना होगा। मेहनत करनी पड़ेगी। टिफिन लेकर निकलना पड़ेगा। आज भूखे को भोजन कराना है, तो निकलना पड़ेगा। कपड़े लेकर निकलना पड़ेगा। घूम के देखना पड़ेगा, किसको जरूरत है, किसको नहीं। यह आपको जाना पड़ेगा। मेहनत करनी पड़ेगी। ऐसे ही नहीं हो जाएगा। इसके लिए काम करना पड़ेगा। समय देना पड़ेगा। कई संस्थाएं सेवार्थ में लगी रहती हैं। क्या उनके माध्यम से भी यह कार्य हो सकता है? हां, अगर आप पूरा जांच लो। दो बातें देखो। एक तो वहां जरूरत है या नहीं, और क्या पक्का वही काम हो रहा है। पता चला कि लगी तो हैं, पर पैसा अपार हो गया है। पता चला कहीं लगे हैं, उनके पास पैसे नहीं हैं, तो खोजो। कर रहे हैं क्या? उनके पास अथाह तो नहीं हो गया। अगर सौ का भोजन करा रहे हैं और उनके पास हजार का भोजन है, सौ जरूरतमंद को करा रहे हैं, तो हजार का आप उसमें क्यों दे रही हो? आप आगे बढ़ो। जांच करके करो। अगर कोई संस्था इस तरीके से सेवा कर रही है, तो देख लो उस संस्था को जरूरत है या नहीं। आवश्यकता देख लीजिए। उस संस्था के व्यवस्थापक से जाकर बातचीत करिए कि क्या आपको जरूरत है। नहीं है, तो हम और कहीं दें। बहुत लोग सेवा कर रहे हैं, और इसमें आपको काम करना पड़ेगा, मेहनत करनी पड़ेगी। आप देखिए कि वह व्यक्ति वही काम कर रहा है या नहीं। पता चला कि वह वीडियो बना के कुछ और डाल रहा है, उसके पीछे कुछ और कर रहा है। जाइए वहां, रहिए, जांचिए। जरूरी नहीं कि वह बातें कह रहा हो और वही कर रहा हो। इसमें काम करना पड़ेगा, मेहनत करनी पड़ेगी। वृद्धाश्रम में कितने केस आ रहे हैं। कहीं लोगों को नर्क की तरह रखा जाता है, एक कपड़े पर बांध के रखा जाता है। आपने जो देखा, वह बताना चाहिए। आप बताओगे तो समाज जागरूक होगा। हम हर बात लाइव में बताते हैं। अगर मैं किसी को गुस्से से भगाता भी हूं, वह भी लाइव में बताता हूं। बताओ, समाज में क्या हो रहा है। अगर कुछ आपको दिखता है, तो आपको बताना चाहिए, जैसे आपने अभी बताया। गंगानगर के वृद्धाश्रम की बात भी वही है। दानदाता खूब देते हैं, पर वहां तक पहुंचता नहीं। देखने की मुख्य बात यही है। जैसे मान लीजिए यहां साधक के लिए निशुल्क भोजन और रहने की व्यवस्था रख दी। यह क्या पक्का है? यह तो आने पर पता चलेगा। वीडियो तो कोई भी, कई लोगों को खड़ा करके बना देगा। भाड़े के आदमी मिल जाएंगे। भैया, वीडियो बनाना है, तुम्हें बस इतना बोलना है, दो चार सौ या हजार ले लो, बस इतना बोलना है। मिल ही जाते हैं। कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। यहां तो लोग एक क्वार्टर पर अपना वोट बेच देते हैं। एक थाली भोजन में, एक क्वार्टर में, गाड़ी का पेट्रोल टंकी भरवा दो, पूरा वोट बेच देते हैं। यह देश ऐसा है। वीडियो बनाने में क्या है? कई लोगों को खड़ा कर दो और बोल दो, हम सालों से रह रहे हैं। बोलने में क्या जाता है? जिसे कुछ मिनट बोलने के हजार रुपये मिल जाएं। यह मेरे परमात्मा हैं, भगवान हैं। बोलने में कुछ नहीं जाता। ऐसा लोग करते हैं कि कोई आए तो दो सौ ले लेना, साष्टांग प्रणाम करना, और बोल देना कि यह मेरे भगवान हैं। सेवा तीन तरह से होती है। शरीर से, धन से, और अपनी समझ से, मानसिक। अब देखिए उस स्थान पर क्या जरूरत है। धन की, तन की, या ज्ञान की। एक व्यक्ति गिर गया, तो वहां आपका धन काम नहीं करेगा। वहां शरीर की ताकत काम करेगी, उसको उठा के अस्पताल ले जाना। वहां पैसा फेंक रही हो, वह पैसा काम नहीं आएगा। कोई कुएं में, गड्ढे में गिर गया हो, हाथ पांव टूट गया हो, तो लाखों करोड़ों रुपया वहां काम आएगा क्या? नहीं आएगा। उसको सुरक्षित उठाकर अस्पताल तक ले जाना है। वहां जाकर पैसा काम आएगा। सलाह भी काम आएगी। पर गड्ढे में गिर के पांव टूट गया हो और आप सलाह दे रहे हो कि हिम्मत लाओ, उड़ जाओ, घसीटो, नहीं। वहां शरीर की मेहनत चाहिए। वहां पैसा काम नहीं करेगा। तो देखिए, किसी संस्था को, किसी व्यक्ति को जरूरत क्या है, आवश्यकता क्या है। अपनी समझ से करिए। व्यवस्थापक को जरूरत होगी तो वह आपसे कहेगा। जरूरत नहीं तो जहां जरूरत मिले वहां जाओ। बिना समझे कुछ मत करो। जब आप किसी गलत व्यक्ति को ताकतवर बनाओगी, वह समाज को नीचे गिराएगा। गलत आदमी गलत काम करेगा। उसे कहीं भी खड़ा कर दो, गलत काम करेगा। और सही आदमी को गलत जगह भी खड़ा कर दो, तो सही काम करेगा। जब भी किसी की सहायता करो, देखो कि वहां कार्य कैसा हो रहा है।

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वीडियो: भाग्य कौन तय करता हैं प्रारब्ध या कर्म ? Aadhyatmik Pratyasth Gyan Yogi · 2025-07-03